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- योगेश छिब्बर पापा , आपके पिता होने में न सुंदरता है, न कोमलता, न कोई मीठा गीत। मैं चाहती हूँ आप शून्य हो जाएँ, मेरे वजूद में से बाहर हों, ताकि मैं खूबसूरत और मुकम्मल हो सकूँ। जानती हूँ, आपको नकारने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए, मगर आप भी जान लें, मेरा यह ख़त उसी हिम्मत की दूसरी क़िस्त है, (पहली क़िस्त थी, आपका विरोध करके घर छोड़ आना)। आपको नकारना मेरे ज़िंदा रहने की पहली शर्त बन गया है .... मुझे विश्वास है, आप अपनी भागी हुई गुमशुदा बागी़ बेटी को ढूँढ़ने की कोई कोशिश नहीं करेंगे। इस जि़द भरे अंहकार के लिए सौ बार धन्यवाद। फिर भी, बता दूँ, यह ख़त किसी ऐसी-वैसी जगह से नहीं लिख रही हूँ। आपका अहंकार में डूबा मूर्खतापूर्ण दावा था कि आपका सहारा न रहा तो हम चारों बहनें बिक जाएँगी। आपका सहारा? अब मैं अपनी साँसें अपने ही सहारे ले रही हूँ, तो जाना है कितनी मीठी होती हैं ये आज़ाद साँसें। आप मंज़र से हटे, और मंज़र खुशगवार हो गया। मम्मी कहती थी कि आपके बाबू जी आपको बड़ी बेरहमी से पीटा करते थे, दिनभर कोठरी में भूखा बंद रखते थे। आपने अपना वही गुस्सा हमारे बचपन पर थूका, सूद के साथ। मेरी मम्मी की मौत पर आप नहीं रोये, क्योंकि मर्द रोते नहीं है, रोना कमजोरी है। मगर मम्मी कहती थी, रोने में बड़ी ताक़त है। आप, आपके ज़िद, अहंकार और जुल्मों के ख़ौफ़ तले जीते रहने की ताक़त मम्मी को रोने से ही मिलती थी। आपके अंधे क्रोध की आंधी सारे घर को, हम सबके वजूद को रौंद देती थी। हम चारों बहनें मम्मी के साथ मिलकर रो लेते थे, जिससे जी इतना हल्का तो हो ही जाता था कि हम आपके जंगली अहंकार का तांडव अगले दिन भी सह लेते थे। सच पापा, अगर यह मिलकर रोना न होता तो मम्मी बहुत पहले ही मर जाती। मुझे लगता है आप इसलिए इतने क्रोधी है क्योंकि आप किसी के सीने पर सिर रखकर रोना नहीं जानते। मम्मी का सीना बहुत मीठा तकिया था, मैं गवाही देती हूँ। मैं सोचा करती थी, अगर इतने जंगली ढंग से पीटने के बाद भी आप मम्मी को अपने सीने पर सिर रखकर रोने देते तो वे शायद सौ साल तक जिंदा रहतीं, और उनका रोना सिर्फ एक बार अपने अहंकारी सीने पर झेलते आप (बिना शराब के नशे में गर्क़ हुए), तो आप वहीं मर जाते, इतनी मौत थी मम्मी के सच्चे आँसुओं में। उस औरत के मरने पर आप रोए तक नहीं। अपनी जिंदगी का सबसे सच्चा रोने का मौक़ा खो दिया आपने! मुझे हमदर्दी है आपके पुरुष होने के तांडवी अहंकार से; आपके जिद्दी पुरुष के आँसुओं से। मम्मी के लिए तो हम चारों बहनें है; मम्मी हमसे जिंदा रहेगी। थोड़ी देर के लिए आप मर्द होना छोड़ सकते तो ..........। अच्छा, आप कांटा ही कांटा हो? कहीं भी थोड़ा-सा फूल नहीं हो? आप थोड़ी देर के लिए माँ नहीं हो सकते, पापा? पुरुष के शरीर में, स्वभाव में कहीं भी माँ होने की गुंजाइश नहीं होती क्या? जवाब दो, पापा। जो भी हो, आपके पुरुष की सत्ता और मेरी जागी हुई स्त्री के बीच जो जंग छिड़ी, उसके लिए आप ही जि़म्मेदार हैं, उसे आप ही हारेंगे। आप मेरे लिए उस दिन सबसे बड़ी चुनौती बन गए थे, जिस दिन इंटरमीडिएट के बाद आपने मुझे आगे पढ़ाने से इंकार कर दिया था, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि आप इंटरमीडिएट तक ही पढ़े हैं। उस दिन मुझे लगा कि आप हमारी जिं़दगी को इसलिए नज़रअंदाज़ करते हैं क्योंकि हम लड़कियाँ हैं। मैं, नन्ही, बीनू और किरन महज ताश के पत्ते हैं, जो आपने गलती से मम्मी की जिदगी में खेल दिए थे, और हार गए थे। घर से अकेले नहीं भागना चाहती थी (भागना नहीं, "मोक्ष अर्जित करना" कहना चाहिए)। भागती तो दीपेश के साथ ही, पर पापा, वह डरपोक है। दूसरे, वह माँ नहीं हो पाता। मुझे तो अपने मन-प्राण पर एक कोमल स्पर्श की ममता का शासन और आश्वासन चाहिए, जो कहीं न कहीं माँ के स्पर्श से मिलता-जुलता हो। मुझे दीपेश के साथ घूमते हुए देख लिया था आपने। इतना गुस्सा क्यों उतर आया आपके वजूद पर? मैंने पचास बार आपको मिस सलूजा के साथ घूमते देखा है। मैं तो आपको कमरे में बंद करके आपकी बाँह पर जलती सिगरेट नहीं रख सकती थी। उस दिन का दृश्य पूरी डिटेल में याद है मुझे। मैं रसोई की तरफ़ जा रही थी। दीपेश ने पहली बार साहस जुटाकर मेरे हाथ को छुआ था। इस तरह की बातें कोई बेटी अपने पापा से नहीं करती, मगर मैं आपको शॉक देना चाहती हूँ, मैं रसोई की तरफ जा रही थी। डोरबेल बजी। मैं दरवाज़ा खोलने गई। मुझे पूरा विश्वास था दीपेश लौटकर आया होगा। मैं गुनगुनाती, अपेक्षाओं से लदी हुई दरवाज़ा खोलने गई। मैं हवा में चलती हुई, लाड़ से भरी ............ धत्त, आप थे। मुझे देखते ही आपने दनादन तमाचे बरसाए। उफ पापा, कितना मारा था आपने ! आप सिर्फ़ इसलिये पीट रहे थे मुझे, क्योंकि आप पुरुष हैं, और बाप हैं। मेरे प्रेम की सज़ा देने के लिए आपने फ़िल्मी विलेन के स्टाइल में अपनी जलती सिगरेट मेरे हाथ पर रख दी। चीख़ें मारती मैं गिर पड़ी थी। नन्ही, बीनू, किरन कोई नहीं आई, मुझे उठाने के लिए। आपका ख़ौफ़। मगर पापा, आप पूछते तो सही, मैं दीपेश के साथ घूमने क्यों गई थी? आप पूछते तो मैं बताती कि उस दिन मैं अपने अंदर की स्त्री के लिए कुछ तय करने गयी थी। आपकी बेटी हूँ तो क्या, एक स्त्री भी तो हूँ। आपने मेरी माँ के स्त्री होने को कुचला था, और अब आप मेरे स्त्री होने के फूल को कुचल रहे थे। मैं बताती आपको कि मैं दीपेश में माँ ढूढने गई थी, वही माँ जो आपकी पत्नी थी। माँ, प्रेमी, पति और स्त्री का अर्थ समझने वाला पुरुष - यह ढूँढ रही थी मैं दीपेश में। मुझे लगा कि ऐसा संभव है। मैं अपने अंदर की स्त्री के लिए आश्वासन ढूँढती दीपेश के आंतरिक स्वभाव में झांक रही थी। पापा, हम दोनों ही अपने लिए आश्वासन ढूँढ रहे थे, फिर सज़ा मुझे ही क्यों? शायद इसलिए कि मैं स्त्री हूँ, बेटी हूँ। यातना देना आपके लिए आसान है, अधिकार भी, मगर पापा, क्या पुरुष बने रहने के लिए यह सब करना ज़रुरी है? आप शराब पीते हैं, अपने सौ तरह के दुखों को भूलने के लिए। भूलने से दुख मिट तो नहीं जाता। आप शराब पीकर अपने दुख भूल जाते हैं, मगर कभी सोचा कि आपकी पत्नी, आपकी बेटियाँ अपने दुख कैसे भुलाती होंगी। शराब सिर्फ पुरुषों के दुख भूलने की दवा है? मैंने अपने सारे दुख भूलने के लिए दीपेश के प्रेम का घूँट भरना चाहा था। आपने चिल्लाकर कहा था, ‘मेरा सहारा न हो तो कहीं कोठों पर जा मरोगी तुम सब।“ कितनी घटिया बात है, पापा। पुरुष का सहारा न हो तो स्त्री कोठे पर पहुँच जाए, फिर कोठे वाली औरतों को किसका सहारा होता है? पुरुष का ही तो। कोठे की पहली सीढ़ी पुरुष है, और आख़िरी सीढ़ी भी पुरुष ही। ऐसी बात कोई बाप अपनी बेटियों से नहीं कह सकता, मगर आप तो शराब के कोठे पर चढ़कर बोल रहे थे। आपकी बात सुनकर मैंने तय कर लिया था कि अपनी अस्मिता, गरिमा को स्थापित करने के लिए मुझे आपके हिंसक पुरुष होने पर प्रहार करना होगा। न आपके पिता होने में सौंदर्य था, न पुरुष होने में गरिमा। मैं अपने प्रति उत्तरदायी होना चाहती थी। मैं अपनी स्त्री के प्रति, अपनी स्त्री के अद्भुत सौंदर्य के प्रति, उत्तरदायी होना चाहती थी। मैं अपनी स्त्री को अपने मीठे प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र करना चाहती थी। दीपेश मेरी स्वतंत्रता का चुनाव था, मेरी स्त्री का चुनाव था, मेरे स्त्री होने का होना था। जी पापा, वह मेरे स्त्री होने का होना था। पिता का सौंदर्य आपमें होता, पिता की महक आपमें उठती, तो मैं बेटी बनकर खिलती। आप पिता की सरगम होते तो मैं बेटी का गीत होती। मगर आप जुल्म थे, तो मैं विद्रोह बन गई। मैं अगले दिन फिर दीपेश से मिली। मैंने उसे अपना जला हुआ हाथ दिखाकर पूछा, ‘दीपेश, यह सिगरेट का निशान तुम्हारा अपमान नहीं क्या?“ मैंने उससे कहा, ‘मुझे अपने साथ अपने घर ले चलो, यही इस निशान का उत्तर है।” लेकिन दीपेश डरपोक है, पापा। उसे भी अपने पापा से बहुत डर लगता है। उसके डैडी बड़ी-बड़ी मूछों वाले कर्नल हैं, और दीपेश उनके सामने लगातार दस मिनट भी सहज होकर नहीं बैठ सकता। दीपेश ने अपने डैडी की सख़्ती के बारे में कुछ कहा, तो मैंने जवाब दिया, ‘दीपेश, यह सिगरेट का निशान तुम्हारा अपमान है, मगर तुम्हारा अपने डैडी के खौफ़ में मेरे साथ खड़ा न होना, मेरा अपमान है। घर लौटकर मैंने आपकी अलमारी में से दस हज़ार रुपये निकाले। जानती हूँ, आप जानबूझ कर अपनी तनख़्वाह लाकर खुले में रख देते थे, अपना ख़ौफ़ कायम रखने के लिए। कोई आपके पैसों को छू भी नहीं सकता था, मम्मी भी नहीं। आप की यही आदत मेरे लिए वरदान बन गई। आपके रुपये, आपकी सिगरेट का दाग, आपकी गालियाँ लेकर मैं अपना शहर छोड़ आई। अपना आकाश, अपनी धरती छोड़ ज़िन्दगी ढूँढने चल पड़ी। इन पद्रंह दिनों में ‘घर’ से दूर रहकर ‘घर’ ढूँढते हुए मैंने जाना है कि स्त्री होने में जितनी सुंदरता है, उतनी ही असुविधा भी। हर आदमी स्त्री को बस.....। मगर चाहूँ भी तो अपना स्त्री होना कम नहीं कर सकती, नष्ट नहीं कर सकती। मेरे अस्तित्व और शरीर पर लिखी यह स्त्री की कविता अब पोंछी-मिटायी नहीं जा सकती। स्त्री होने को जीऊँगी, पापा; भरपूर जीऊँगी। इसके पूरे मीठे-कड़वे स्वाद के साथ। अपनी जिंदगी को पुरुष न बनने दूँगी। जिंदगी जहाँ-जहाँ पुरुष है, पापा है, दीपेश है, वहाँ-वहाँ से बचकर जीना है। मुझे समझ आ गया है कि पुरुष के साथ जीना बड़ी एहतियात का काम है, पुरुष के बगैर जीना भी बड़ी एहतियात का काम है। नन्ही, बीनू और किरन भी मेरी तरह एक दिन इसी यात्रा पर निकलेंगी, अपनी स्त्री की गरिमा यात्रा पर; मगर खुद को रोक कर उन्हें रोक लीजिए, पापा। घर से बाहर ज़िन्दगी बड़ी कंटीली होती है। मेरी तो ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरी बहनें घर में रहकर भी ज़िन्दा रहें। उन्हें भी अगर ज़िन्दगी की व्याकरण सीखनी है, तो अपने फ़ैसलों की धूप में तपना होगा। पापा, आप नहीं जानते स्त्री होने का एक निश्चित अर्थ है - सुंदर से सुंदर, गहरे से गहरा अर्थ। मैं अभी ठीक-ठीक नहीं जानती, यह अर्थ क्या है, मगर इसकी मिठास और खुशबू को पहचानती हूँ। इस गहरे-सुंदर अर्थ से ही तो स्त्री होना ब्रह्मांड की सबसे बड़ी घटना है। मछली में कुछ-कुछ स्त्री के संस्कार होते हैं, पापा। पानी के साथ मछली जो संबंध बना लेती है, उसे स्त्री ही समझ सकती है। स्त्री ब्रह्मांड में सबसे गहरी जुड़ने की प्रक्रिया है - She wants to belong passionately! स्त्री की मछली को अपने लिए किसी पानी की तलाश होती है। मैं अपना पानी ढूँढने निकली हूँ। बहुत कुछ कह गई मैं। कहना ही चाहिए था, नहीं तो दम घुट जाता मेरा। आप हमेशा कहते रहे मैं ज़्यादा रिएक्ट करती हूँ। हज़ारों साल हो चुके स्त्री ने बहुत कम रिएक्ट किया। सहना, सहना, और मर जाना ही उसका रिएक्शन था। मैं अपनी घुटन की चिता पर सती होने वाली सहनशील स्त्री नहीं हूँ। मैं अपनी माँ का वही रिएक्शन हूँ जो कभी ज़ाहिर नहीं हुआ, इतिहास की सारी औरतों का रिएक्शन हूँ जो औरतों के सीने में जमा होता रहा। गूँगी औरतों का संवाद हूँ जो आज मेरे हौसले के रंगमंच से बोला जा रहा है। इस ख़त में एक बेटी की संस्कृति नहीं है न, पापा। बेटियों को ऐसे ख़त लिखने की इजाज़त नहीं देती आपकी पुरुष संस्कृति। बेटियों को गूँगा रखना ख़ानदानी शान रही है। गूँगी, झुकी हुई, दबी-ढकी बेटियाँ, सबको अच्छी लगती हैं। मगर पापा, जिस बेटी के अंदर खरी स्त्री जाग उठी हो, वह अपना खिलना रोक नहीं सकती। वह परिभाषित होना चाहती है अपनी खुशबू से। मिसेज़ रत्ना मम्मी की अच्छी सहेली भी थी। मम्मी को अच्छी लगती थी। आपके दफ़्तर में वही एक हैं, जो गुनगुनाती रहती हैं। उनके साथ उठने-बैठने से शायद आपका गुस्सा भी कम हो जाए, शायद आप भी गुनगुनाने लगें। हमारे ‘घर’, नन्ही, बीनू, किरन के लिए यह कितना अच्छा होगा। एक बात और - डर की वजह से कभी कह न सकी। काली धारियों वाली पीली शर्ट आप पर बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, उसे न पहना करो, पापा। मैंने लिखा था कि मैं आपको बीमार कर देना चाहती हूँ, मगर मेरे भीतर किसी रिश्ते का संस्कार प्रार्थना कर रहा है कि आप स्वस्थ रहें। रिश्ता कमज़ोर हुआ है, रिश्ते के संस्कार नहीं। इतने वर्षों तक मम्मी, बहनों और अपने विरुद्ध हिंसा के बदले सब बुरा-भला कह लिया मैने तो मेरे भीतर की खरी स्त्री शान्त हो गई है, किन्तु मेरे अंदर आपकी बेटी भी है, जो कह रही है पापा को यह कब कैसे लिख सकती हूं। शायद मैं भागी हुई लड़की का ख़त आपको कभी नहीं भेजूंगी। एक स्त्री ने लिखा, एक बेटी ने रोक लिया! नन्ही, बीनू, किरन की बहन नीति
योगेश छिब्बर,
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