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राष्ट्र पुरुष श्री कृष्ण से !

Posted by Sushant Singhal on September 1, 2010 at 12:01 AM

सच-सच मुझे बतादो कान्हां 

क्या हमने तुमको पहिचाना ?


नटवर तुम यमुना तट खेले, साथ ग्वाल गोपी गौ ले ले

वन उपवन तो साफ कर दिये लगते वहां धर्म के मेले


कहते तुमको रास रचैया, आज नाचते भगिनी भइया

सांस्कृतिक मण्डल चलते हैं, डूबी लाज धर्म की नइया


गोपी 'वेटिंग गर्ल'  बन गई, छाछ दही को कहते हाला

कृष्ण तुम्हें आदर्श बनाकर, हमने सब चौपट कर डाला।


तुम प्रभु के अवतार कहाते, दिशि-दिशि, निशि दिन पूजे जाते

किन्तु तुम्हारे आदर्शों पर चलने से हम तो घबराते|


'कृष्ण हजारों रानी वाला',  अपना हो जाता मुंह काला

'माखन चोर', चोर के मन पर रहता, सदा जेल का ताला


चीर हरण की कथा बन गयी, कैसी होंगी प्रभु वो बाला

घरवाली के वस्त्र छिपा दूं, रुप धरेंगी चण्डी वाला


कृष्ण बतादे क्या इन कृतियों ने ही तेरा नाम किया है

या भक्तों की मुक्त कल्पना ने तुमको बदनाम किया है


कौन याद करता है तुमको राजनीति के गुरु के नाते

कृष्ण तुम्हारे इन चित्रों में  कितने गीत ज्ञान सुनाते


राधा कृष्ण शीर्षक लेकर नग्न वासनाएं पलती हैं

कृष्ण कीर्तन की तरंग में, मदन तरंगे भी चलती हैं।


महायुद्ध नाविल कहलाता, पार्थ न जाने कहां सो गया

मुरली की स्वर लहरी मे ही पांचजन्य का नाद खो गया|


तेरी मान बिन्दु वे गइयां, अब तक भी काटी जाती हैं

हां स्वराज्य में ही स्वमान्यता की कब्रें पाटी जाती हैं।


देशी दूध अफारा करता, मिल्क मेड लेना होता है

अरु विदेश को भी मुद्रा हित, गऊ चाम देना होता है।


आज पूतना चढी आ रही, सीमा से गर्जन आती है

शकुनि  से, शिशु पाल सरीखे, जयद्रथ जैसे उत्पाती हैं।


निर्बल के बलधाम तुम्हीं हो, तुम आदर्श ब्रह्मचारी हो

भीष्म पाप के साथ हो गये, बल दो, धर्म-चक्र धारी हो।


तुम युग पुरु, युग परिवर्तक हो, कलाकार के भाव मोड दो,

चक्र उठाओ, शंख नाद दो, अब राधा का हाथ छोड दो।


दो विराट दर्शन, भारत के उर से भ्रामक तिमिर मिटाने,

तुम्हीं धर्म हो, तुम्हीं नीति हो, राष्ट्र पुरुष हो, सब जग जाने|


सच-सच मुझे बतादो कान्हा,

क्या हमने तुमको पहिचाना ?


-    डॉ. श्रीकृष्ण संगल 


7 जुलाई 1966

 


Categories: Socio-cultural, Random Thoughts, Tidbits

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2 Comments

Reply Bharat Bhushan
03:07 PM on September 03, 2010 
Blessed are those who remember their high tradition and struggle to behold it
Reply VIKAS
11:29 AM on September 02, 2010 
HAMNE KANHA KO ABHI TAK NAHI PAHCHANA ................

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