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कल स्थानीय जनमंच सभागार में श्रद्धेय गुरुजी योगीराज पद्मश्री भारत भूषण जी की षष्टिपूर्ति के उल्लासमय अवसर पर उनकी योग्य सुपुत्री एवं शिष्या आचार्या प्रतिष्ठा ने अपने शिष्यों व शिष्याओं के साथ मिल कर “उल्लास पर्व” का भव्य आयोजन किया। बाल व किशोर आयु वर्ग की शिष्याओं और शिष्यों को दो वर्ष के छोटे से अंतराल में कत्थक जैसे कठिन नृत्य में इतनी निपुणता प्रदान कर देना कि वह अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अपनी योग्य गुरु आचार्या प्रतिष्ठा के साथ मंच पर प्रस्तुति दे सकें, स्वयं में एक चमत्कार जैसा ही है ! नृत्य नाटिका के माध्यम से पद्मश्री भारत भूषण जी के जन्म से लेकर आज तक की प्रमुख घटनाओं को सुर और ताल के साथ इतनी कलात्मकता के साथ प्रस्तुत किया गया कि मेरे जैसे लोग जो कत्थक का ककहरा भी नहीं जानते, वह भी अपनी सीट के चिपके हुए एकटक मंच पर ध्यान केन्द्रित किये रहे ! भारत कालेज ऑफ परफार्मिंग आर्ट्स Bharat College of Performing Arts (BCPA) की प्राचार्या - आचार्या प्रतिष्ठा और उनके शिष्य व शिष्याओं को हार्दिक अभिनन्दन, साधुवाद एवं उज्ज्वल भविष्य हेतु शुभ कामनायें!

रहा सवाल श्रद्धेय गुरुजी पद्मश्री भारत भूषणजी का ! उनकी योग्यता, ज्ञान व योग के प्रति समर्पण के कारण किस – किस देश में उनके कितने हज़ार या लाख शिष्य हैं, यह हिसाब – किताब तो वह स्वयं भी नहीं रख पाते होंगे। वह एक महान और विराट् व्यक्तित्व हैं, यहतो स्वयंसिद्ध है पर मेरी दृष्टि में उनकी महानता सबसे अधिक इस बात में है कि वह अपनी महानता के बावजूद नितान्त सहज और सरल हैं। बात-बात पर उनका निश्छल, बालसुलभ हास्य (जो अक्सर अट्टहास बन कर उनके आस-पास उपस्थित लोगों को आनन्द से भर देता है।
उनके हृदय की उज्ज्वलता का परिचायक है। सहारनपुर में आने के बाद मैं उनके बारे में समाचारपत्रों में पढ़ता रहता था, विभिन्न कार्यक्रमों में सभापति / मुख्य वक्ता के रूप में उनको विराजमान देखा करता था। एक बार अद्भुत दृश्य देखने को मिला । एक कार्यक्रम में वह मुख्य अतिथि थे । कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद वह मंच से उतरे तो श्रोताओं में उपस्थित एक व्यक्ति के चरणों में गिर गये और साक्षात् दंडवत् प्रणाम किया। पता चला कि वह श्रोता विद्यालय काल में उनके गुरु थे। ऐसे श्रेष्ठ व्यक्तित्व से मैं भी व्यक्तिगत परिचय प्राप्त करूं यह लालसा मन में बनी रही पर संकोच के कारण अनेक वर्ष यूं ही बिता दिये। एक बार उनको दीपावली पर शुभ कामना संदेश ई-मेल किया । उनसे उत्तर मिले, यह इच्छा तो थी, पर आशा नहीं थी ! मेरे आश्चर्य और प्रसन्नता का ठिकाना न था, जब कुछ ही घंटे बाद उनका फोन आया और बोले "मैं भारत बोल रहा हूं ! आपकी ईमेल मैने कम से कम सौ लोगों को आगे प्रेषित की है ताकि ये शुभ विचार अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सकें!" Wow ! उन्होंने घर पर आने हेतु निमंत्रण दिया तो लगा कि मुंह मांगी मुराद मिल गई ! पहला अंतरंग परिचय उनसे उनकी ही डायनिंग टेबिल पर हुआ! दो घंटे की प्रथम मुलाकात के दौरान उन्होंने न तो एक बार भी घड़ी की ओर देखा और न ही मुझे ऐसा लगा कि अब नमस्कार करके विदा ले लेनी चाहिये! अंततः जब चलने के लिये अनुमति मांगी तो बोले, “यदि पन्द्रह मिनट का समय है तो आइये, चलते हैं!” पूरा परिवार कार में बैठा और गाड़ी जाकर रुकी घंटाघर के निकट एक आइसक्रीम पार्लर पर ! यह एक प्रगाढ़, अंतरंग मैत्री का शुभारंभ था !
एक बार कहीं पढ़ा था कि जैसे – जैसे आप किसी’महान’ व्यक्ति के, किसी सेलिब्रिटी के निकट परिचय में आते हैं तो आपके मन में उसके प्रति मौजूद आदर भाव क्रमशः कम होता जाता है क्योंकि आप न केवल उस व्यक्ति की महानता से, बल्कि उसकी कमियों से भी परिचित होते चले जाते हैं। अक्सर महान कहलाने वाले, सेलिब्रिटी माने जाने वाले व्यक्तियों के ’पब्लिक फेस’ और ’प्राइवेट फेस’ में धरती-आकाश का अन्तर होता है। परन्तु पद्म श्री भारत भूषण जी और आचार्या प्रतिष्ठा – दोनों के ही मामले में यह थ्योरी फेल हो जाती है। इन दोनों ही व्यक्तित्वों से मेरी जितनी प्रगाढ़ मैत्री होती जाती है, उतना ही आदर भी बढ़ता हुआ अनुभव करता हूं! शायद ऐसा इसलिये हो पा रहा है कि इन्होंने महानता का आवरण ओढ़ा हुआ नहीं है। इनका वैशिष्ट्य तो सारे जगत को मालूम ही है जो इनको उच्च धरातल पर ले जाकर बैठाता है। यह इनका ’पब्लिक फेस’ है जो बहुत चित्ताकर्षक है और लोगों को अपनी ओर खींचता है। परन्तु इनका ’प्राइवेट फेस’ यानि आंतरिक व्यक्तित्व भी इतना ही अधिक, या शायद और भी अधिक, सरल, निश्छल और सहज है जो मेरी दृष्टि में वास्तविक रूप में महान होने की सबसे पहली आवश्यक अर्हता है! इनके साथ बैठ कर सोचना नहीं पड़ता कि क्या बात की जाये! बातों में से बातें सहज रूप मेंस्वयंमेव ही निकलती चली जाती हैं, कभी किसी के प्रति दुर्भावनापूर्ण विचार सुनने को नहीं मिलते, बातचीत में कभी नकारात्मकता का समावेश नहीं होता ! किसी को महज ’इंप्रेस’ करने के लिये भारी-भरकम बातें करने की आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती ! पूर्णतःसहज, सरल और उन्मुक्त, जैसे अपने घर के ही सदस्यों के बीच में बैठे हों ! श्रद्धेय गुरुजी कभी इस यह भी प्रतीक्षा नहीं करते कि दूसरा उनको नमस्कार करे तो वह उत्तर दें ! खुद अपनी ओर से आगे बढ़ कर प्रणाम करने में उनको कभी कठिनाई नहीं होती !
परम पिता परमात्मा से विनती है कि ऐसे श्रेष्ठ व्यक्तित्वों की संख्या में दिनानुदिन श्रीवृद्धि हो और हम सब को उनका निरंतर सान्निध्य और स्नेह अनन्त काल तक मिलता रहे !
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पिछले दो वर्षों में सहारनपुर नगर पूरे उत्तरप्रदेश में अपनी पांवधोई नदी के कारण चर्चा में रहा है। ‘सहारनपुर में जनता व प्रशासन मिल कर अपनी पांवधोईनदी को साफ करने का अभियान छेड़े हुए हैं ‘ यह समाचार और इस अभियान से जुड़ी खबरें लगभग हर रोज़ समाचार पत्रों की सुर्खियां बनते रहे हैं । सहारनपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक कुमार ने व्यक्तिगत रुचि लेते हुए इस अभियान को नेतृत्व दिया और उनके पीछे-पीछे पूरा प्रशासनिक अमला पांवधोई की सफाई के लिये दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ता दिखाई दिया तो जनता और मीडिया में भी उत्साह का ज्वार आ गया। जिलाधिकारीने इस अभियान को संचालित करने के लिये “पांवधोई बचाओ समिति” का गठन किया जिसमें ११प्रशासनिक अधिकारी और ११ प्रतिनिधि जनता में से नामित किये गये। समिति के सभी सदस्य पूरे उत्साह से हर रोज़ सुबहपांवधोई के तटों पर सफाई अभियान को गति प्रदान करते हुए दिखाई देने लगे।
इसअभियान को जनता ने उस दिन पूर्ण सफलता का प्रमाण पत्र प्रदान कर दिया जब एक अविस्मरणीयशाम को नदी तट पर आ जुटे हज़ारों स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों ने अपनी विस्मित आंखोंसे केवट लीला का पांवधोई नदी के अंदर वह मंचन देखा जो पैंतीस साल पहले नदी में व्याप्तभयानक गंदगी के कारण बन्द कर दिया गया था। केवल चार माह में नदी का इतना साफ हो जाना कि उसमें राम – सीता और लक्ष्मण नावमें सवारी कर के भूतेश्वर मंदिर से रामेश्वर मंदिर तक जा सकें – एक चमत्कार जैसा हीथा और ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि इस आंदोलन को नेतृत्व प्रदान कर रहे जिलाधिकारीएक प्रशासनिक अधिकारी के स्थान पर लोक नायक के रूप में देखे जाने लगे । “पांवधोई बचाओ समिति” की कर्मठता की भी भूरि – भूरिप्रशंसा हुई और उत्तर प्रदेश सरकार ने चौबीस जनपदों के जिलाधिकारियों को निर्देश देदिये कि पांवधोई नदी के सफाई अभियान को आदर्श मानते हुए वह भी अपने अपने जनपदों मेंस्थित नदियों के पुनरुद्धार का कार्यक्रम चलायें ! वाह ! सहारनपुर पूरे उत्तर प्रदेश के लिये एक आदर्श बन गया !
परन्तु जो लोग यह सोच रहे थे कि “एक बार साफकर दिये जाने के बाद पांवधोई गंगा अब भविष्य में पुनः गंदी नहीं होगी” यह देख कर बड़े निराश और दुःखी हुए कि अगले वर्षरामलीला आते – आते नदी पुनः भयानक रूप से गंदी हो चुकी थी। पिछले सफाई अभियान के नायक जिलाधिकारी आलोक कुमारसहारनपुर से जा चुके थे पर जन – आकांक्षाओं के दबाव में प्रशासन ने नदी के उस भाग में,जहां केवट लीला मंचित की जानी थी, एक सप्ताह के लिये हड़बड़ी में विशेष सफाई अभियान चलायाऔर नदी को इस लायक कर लिया कि रामलीला समिति के पदाधिकारी वहां केवल लीला हेतु हामीभर दें ! जैसे – तैसे मंचन संपन्न हो गया औरप्रशासन व “पांवधोई बचाओ समिति” ने भी राहत की सांस ली।
परन्तु पांवधोई गंगा के साफ सुथरे स्वरूप कीकुछ लोगों को बार बार याद आती रही और नदी के पुनः गंदे हो जाने का क्षोभ समाचार पत्रोंमें छलकने लगा । प्रशासन और पांवधोई बचाव समितिके सदस्यों को ललकारा जाने लगा कि कहां सो गये पांवधोई के पालनहारों ! बस, जन आकांक्षाओं का दबाव पुनः बढ़ने लगा तो आनन– फानन में मीटिंग बुला कर संकल्प लिया गया कि सफाई अभियान पुनः चलाया जायेगा। पर इस बार न तो प्रशासन में उत्साह है और न ही जनतामें! यक्ष प्रश्न है कि ऐसा क्यों हो रहाहै? आखिर पांवधोई गंगा बार – बार इतनी गंदीक्यों हो जाती है कि कुछ महीनों में ही इसमें बीसियों जे.सी.बी. मशीनें और ट्रक उतारनेपड़ते हैं और हज़ारों टन मलबा बाहर निकाल कर फेंकना पड़ता है?
दो वर्ष पहले १२ मई २०१० से आरंभ हुए सफाई अभियानके बाद चार मास के अल्प काल में ही पांवधोई नदी का निखरा – निखरा उज्ज्वल स्वरूप देखकरसहारनपुर वासियों के उत्साह का कोई ओर-छोर नहीं था । सफाई अभियान से जुड़ा हर व्यक्तिआत्ममुग्ध था और अपनी पीठ थपथपा रहा था। जनताभी प्रशासन और पांवधोई बचाओ समिति की जय-जयकार कर रही थी। पर पांवधोई नदी को साफ – सुथरा उज्ज्वल स्वरूप प्रदान करने में जहांइस बात का योगदान था कि उन चार महीनों में नदी में से लगभग आठ हज़ार ट्रक मलबा बाहरफेंक दिया गया था वहीं इस बात का भी महत्वपूर्ण योगदान था कि जुलाई – अगस्त – सितंबरमें मानसूनी वर्षा से नदी में साफ सुथरे पानी की भरमार हो गई और तीव्र गति से बह रहेवर्षा जल ने नदी की तलहटी में जमी हुई बची-खुची गंदगी को आगे धकेल दिया। वर्षा का साफ सुथरा पानी नदी में इतना अधिक हो गयाकि नदी को निरंतर सड़ा रहे सरकारी नाले और सीवर भी वर्षा के दिनों में निष्प्रभावी सेहो गये। पांवधोई बचाओ समिति की बैठकों के दौरानइन नालों का ज़िक्र करने से और नगर की जल-मल निकासी व्यवस्था को सुधारने की आवश्यकतापर बल देने से पांवधोई सफाई अभियान के संचालकगण उन दिनों नाराज़ हो जाते थे और उनकोलगता था कि जब हर कोई जय-जयकार कर रहा है तो ये क्यों इन कठिन मसलों को उठा कर मूडखराब कर रहे हैं? पर क्या शुतुरमुर्ग की तरहसे रेत में गर्दन दबा लेने से कठिन समस्याओं से पार पाया जा सकता है? समस्याओं की ओर बार – बार इंगित करने वाले व्यक्तिकी आप उपेक्षा तो कर सकते हैं पर उन समस्याओं का निराकरण तो फिर भी आपको करना ही पड़ेगा!
पांवधोई ही नहीं, देश की अनेकानेक नदियों कीदुर्दशा का एक प्रमुख कारण यह है कि शहरी विकास के नाम पर नदियों को शहर भर की गंदगीको ढोने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। हमारे प्रशासकों को ठोस और तरल कूड़े के निस्तारणका यह सबसे सरल और सुविधाजनक उपाय नज़र आता है कि सारे कूड़े और रसायनों को नदी तक पहुंचादिया जाये ताकि नदी अपने प्रवाह के साथ इस सारी गंदगी को आगे ले जाये ! ऐसे में, न सिर्फ ठोस कूड़ा करकट, बल्कि घरों, दुकानों, फैक्टरियों, मिलों से निःसृत होरहा गंदा पानी व रसायन नदियों में पहुंचा दिये जाते हैं और यह मान लिया जाता है किगंदगी की समस्या से मुक्ति मिल गई है। वैज्ञानिकरीति से ठोस कूड़े और तरल रसायनों के निस्तारण में मेहनत करनी पड़ती है, दिमाग और पैसाखर्च करना पड़ता है, ऐसे में सीधा, सस्ता और सुगम उपाय हर किसी को यह दिखाई देता हैकि बह रहे पानी में सारी गंदगी डाल दो। आंखओझल, पहाड़ ओझल !
सहारनपुर की पांवधोई नदी भी शहर के बीचों बीचसे निकलने के अपने ’अपराध’ का अनेक दशकों से यही दंड पाती रही है। सैंकड़ों सरकारी और गैर सरकारी नाले - नालियां औरसीवर इस नदी में उतारे जा रहे हैं। नगर पालिका ने नदी के दोनों तटों पर खुले आकाश केतले बीसियों कूड़ा संग्रह केन्द्र बना डाले हैं। दोनों तटों पर स्थान-स्थान पर शौचालय और मूत्रालय बनाये गये, गाय-भैंसों केतबेले बनाये गये और यह नितान्त स्वाभाविक माना गया कि यह सारी गंदगी जस की तस नदी मेंपहुंचा दी जाये। नगर में प्रवेश के साथ हीजब पांवधोई नदी भूतेश्वर मंदिर के आगे से निकली तो मूर्तियां और पूजा का सामान इसमेंप्रवाहित कर दिया गया, अनाज मंडी से निकलीतो छान कर निकाला गया कूड़ा नदी के हवाले कर दिया गया। थोड़ा सा आगे चल कर नदी सब्ज़ीमंडी में पहुंची तो बचे खुचे, सड़े गले फल, सब्ज़ियों के छिलके, पैकिंग मैटीरियल, पॉलीथिनकी थैलियां नदी को भेंट कर दी गईं ! वर्षोंऔर दशकों तक यही सब देखते-देखते हालत यह हो गई कि लोग पांवधोई को नदी नहीं बल्कि गंदानाला ही मानने लगे! वर्ष २००७ में जब पांवधोईनदी के वास्तविक पावन स्वरूप को वापिस लौटाने हेतु इस लेखक द्वारा कुछ मित्रों को साथलेकर अभियान आरंभ किया गया तो सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि जनता को पांवधोई नदी का वास्तविकपरिचय कैसे पहुंचाया जाये! नगर पालिका और जिलाप्रशासन को भी ऐसी कोई जरूरत अनुभव नहीं होती थी कि इस “गंदे नाले” का उद्धार करकेइसका पावन स्वरूप इसे लौटाया जाये। आई. आई.ए. जैसी बड़ी संस्थाओं ने अपने स्तर पर सफाई के प्रयास किये, लाखों रुपये खर्च कियेपर कुछ ही दिनों में नदी को पुनः जैसे का तैसा होता देख कर वह भी हिम्मत हार बैठे!
वर्ष २०१० में जिलाधिकारी आलोक कुमार के नेतृत्वमें चलाये गये पांवधोई बचाओ अभियान के दौरान २००७ में निर्मित कार्य-योजना को स्वीकारकिया गया और इस अभियान का सबसे सफल पक्ष यह है कि आज किसी को यह बताने की आवश्यकतानहीं रह गई है कि पांवधोई गंदा नाला नहीं हैबल्कि पावन गंगा की एक धारा है। उस दौरान समाचार पत्रों के माध्यम से जो जन-जागरणअभियान चलाया गया, उससे जनता में इस नदी के उद्धार की भावना और सफाई अभियान के साथजुड़ने हेतु उत्साह जगा है। पर नदी को बार– बार गंदगी की ओर लौटा रहे मूलभूत कारकों को लेकर प्रशासन का रवैया आज भी चलताऊ है। इन उपायों की क्षण-भंगुरता को देखते हुए, वहीपुराना उत्साह दोबारा अनुभव करना भी कठिन हो रहा है। प्रशासन को पांवधोई का सफाई अभियान अब गले पड़ा ढोलअनुभव होने लगा है जिसे चाहे न चाहे, उसे बजाना पड़ेगा। मन ही मन प्रशासन के वर्तमान अधिकारी पूर्व जिलाधिकारी आलोककुमार को कोसते रहते होंगे कि खुद तो इलाहाबाद चले गये, ये मुसीबत हमारे गले में बांधगये। अब प्रशासन कुछ हरकत करता दिखाई देताभी है तो वह महज जन – आकांक्षाओं के दबाव में। कुछ करने की सूझती है तो बस यही कि कुछ सफाई कर्मचारी नदी में उतार दिये जायेंजो कूड़ा बीनते रहें। ज्यादा दबाव पड़ता है तोजे.सी.बी. मशीन और ट्रक भी नदी में उतार दिये जाते हैं। परन्तु मूल समस्या तो जस की तस है।
जैसा कि पहले इंगित किया गया है, नदी में अनेकानेकसरकारी नाले उतारे जा रहे हैं जो पूरे शहर की गंदगी नदी को सौंपते हैं। इन नालों के अतिरिक्त नगर निगम ने नदी के दोनोंतटों पर शौचालय, मूत्रालय और कूड़ा संग्रह केन्द्र बना रखे हैं । कूड़ा संग्रह केन्द्र का अर्थ है कि खुले आकाश केनीचे व्यस्त मार्गों पर, आधी से अधिक सड़क घेर कर पूरे शहर का कूड़ा, इंसानों और जानवरोंका मल आदि फैला दिया जाता है जिसे नगर पालिका के ट्रक कुछ घंटों या कुछ दिनों के बादउठाते हैं। आवारा गाय, कुत्ते और सुअर दिन भर इन कूड़ा घरों पर अपने लिये भोजन तलाशतेहुए देखे जा सकते हैं। नदी के तट पर बनाये गये इन कूड़ा संग्रह केन्द्रों में से कुछअपशिष्ट नदी में पहुंच जाता है। नगर निगम नेसहारनपुर नगर के बीचों बीच से बहने वाली पांवधोई नदी के दोनों तटों को कूड़ा संग्रहकेन्द्र के रूप में उपयोग करने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त स्थान माना – इससे नगर निगमके प्रशासकों के चिंतन की दिशा और दशा स्पष्ट हो जाती है।
पांवधोई नदी के तट को धोबीघाट के रूप में इस्तेमालकरने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त मानना नगर निगम के अधिकारियों की विकृत सोच का एक औरशर्मनाक नमूना है। धोबीघाट पर तत्कालीन मंत्रियोंके नाम के पत्थर लगे हुए आज भी देखे जा सकते हैं। नदी के तट पर धोबीघाट का फीता काटतेहुए इन मंत्रियों को बहुत गर्व अनुभव हुआ होगा। परन्तु जब तक नगर निगम अपने नालों को पांवधोई से बाहर नहीं करेगी, अपने कूड़ा संग्रह केन्द्रों को नदी तट से स्थानांतरितनहीं करेगी, धोबीघाट को किसी अन्य स्थान परनहीं ले जाया जायेगा, नदी तट पर बनाये गये शौचालयों और मूत्रालयों को नहीं हटाया जायेगा– तब तक पांवधोई की सफाई की कल्पना आत्म प्रवंचना ही है इससे अधिक कुछ भी नहीं! किसी शहरकी नदी कितनी साफ है या गंदी है यह उस शहर की जल-मल निकासी व्यवस्था की सफलता या असफलताका सबसे अधिक विश्वसनीय पैमाना है। खेद के साथ कहना पड़ता है कि सहारनपुर के लिये जल-मलकी निकासी व्यवस्था का निर्णय करने वाले नीति – निर्धारकों और प्रशासकों ने अपनी बुद्धिमत्ताऔर दूरदृष्टि का परिचय नहीं दिया है। जब तकप्रशासन दशकों से चली आ रही अपनी विकृत जल-मल निकासी व्यवस्था में आमूल – चूल परिवर्तननहीं करेगा, तब तक नदी गंदी ही रहेगी!
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कमलनाथ की एक मनमोहक कृति
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में प्रसिद्ध हो रहे सहारनपुर की शान में एक और तमगा लगा है और इस तमगे का नाम है - कमलनाथ ! वर्ष 1969 में कलकत्ता में जन्मे कमलनाथ एक ऐसे कलाकार हैं जो किसी कला महाविद्यालय से ड्राइंग पेंटिंग की शिक्षा विधिवत रूप से ग्रहण न करने के बावजूद अपनी अद्भुत प्रतिभा के बल पर देश - विदेश में लाखों लोगों के चहेते बन चुके हैं। आपकी बनाई हुई ऑयल पेंटिग्स की प्रदर्शनी न केवल भारत में बल्कि कनाडा, आस्ट्रेलिया, दुबई और सिंगापुर आदि अन्य देशों में भी लगाई गई हैं और देश विदेश में अनेक लोगों ने आपके किये गये अद्भुत कार्य को अपने ड्राइंग रूप व शयनकक्ष की दीवारों पर गर्व के साथ सजाया है।
प्रस्तुत है कमलनाथ के साथ एक विशेष बातचीत जो ताज होटल में आज ही आरंभ हुई त्रि-दिवसीय प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर कला-दीर्घा में घूमते- घूमते, उनके द्वारा बनाये गये तैल चित्रों का अवलोकन करते करते हुई !

सहा. डॉट कॉम - पेंटिंग करने के लिये कैनवस और ब्रश हाथ में लेने हेतु आपको प्रेरणा कहां से मिलती है?
कमलनाथ - पेंटिंग करना मुझे भाता है, कैनवस के आगे जब मैं आ खड़ा होता हूं तो मुझे और कुछ भी होश नहीं रहता ! प्रेरणा कौन है, यह भी स्पष्ट रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता ।
सहा.डॉट कॉम - पर फिर भी, पेंटिंग बना लेने के बाद आप उसे सबसे पहले किसको दिखाना चाहते हैं ?
कमलनाथ - घर में पेंटिंग करता हूं, कहीं एकांत में नहीं अतः पत्नी और बच्चे तो मुझे कैनवस पर कार्य करते हुए देखते ही रहते हैं। किसी अन्य विशेष व्यक्ति को दिखाने का प्रयास करता हूं, ऐसा तो मुझे नहीं लगता !
सहा.डॉट कॉम - यहां प्रदर्शित आपकी लगभग सभी कृतियों में नारी के ही विभिन्न रूपों का ही चित्रण है, कुछ चेहरे भारतीय हैं तो कुछ विदेशी हैं। पेंटिंग बनाते समय क्या कोई परिचित चेहरा कैनवस पर बार - बार उभरने लगता है?
कमलनाथ - कुछ पेंटिंग में तो मेरा अपना बेटा ही चित्रित हुआ है जिसको विभिन्न काल्पनिक रूपों में देखता हूं। पर इनमें से उसका कोई भी स्वरूप ऐसा नहीं है, जो वास्तविक हो । यह यथार्थ और कल्पना का मनमाना मिश्रण है। कभी कभी कोई दृश्य मन को बहुत भा जाता है तो उसे उस समय अपने कैमरे में संजो लेता हूं। बाद में उसमें अपनी कल्पना के अनुसार परिवर्तन करके मनमाने रंग भरता रहता हुं ।
सहा. डॉट कॉम - आपकी दृष्टि में कलाकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कितनी होनी चाहिये? क्या किसी कलाकार को अपनी रचनाओं से किसी की भावनाओं को आहत करने की अनुमति दी जा सकती है?
कमलनाथ - यदि आप यह एम.एफ. हुसैन साहब की कुछ कृतियों को लेकर उठे विवाद के संदर्भ में पूछ रहे हैं तो मेरा स्पष्ट मानना है कि कोई भी कलाकार कभी किसी की भावनाओं को जानबूझ कर आहत करने का काम नहीं करना चाहेगा। यदि किसी रचना से किसी धार्मिक समूह की भावना आहत हुई हों तो उसे अपनी रचना वापिस ले लेनी चाहिये और भविष्य में कहीं पर प्रदर्शित नहीं करनी चाहिये।
सहा. डॉट कॉम - पर एम.एफ. हुसैन ने तो अनेकानेक कृतियां ऐसी बनाईं जो हिन्दू जनमानस को उद्वेलित करती हैं, उनको देख कर क्रोध आता है। और किसी भी धर्म के देवी - देवता को तो उन्होंने ऐसे कभी भी चित्रित नहीं किया ।
कमलनाथ - हुसैन साहब बहुत बड़े कलाकार रहे हैं और मैं उनके सम्मुख कुछ भी नहीं फिर भी इतना तो कह सकता हूं कि यदि मेरी किसी रचना से कभी भी, किसी को भी दुःख पहुंचेगा तो मैं स्पष्ट शब्दों में माफी मांगते हुए ऐसी किसी भी रचना को कहीं पर भी प्रदर्शित या प्रकाशित नहीं कराऊंगा। मेरे लिये मेरी ये कला व्यवसाय नहीं है, स्वयं खुश रहने और दुनिया में खुशियां बिखेरने का साधन है। इससे किसी के हृदय को चोट पहुंचे, यह मुझे स्वीकार्य नहीं है। मेरे चित्र सकारात्मक हैं, जीवन के उजले पक्ष को सम्मुख रखते हैं और देखने वालों के मन में जीवन के प्रति आस्था जगाते हैं। मुझे कला का यही रूप पसन्द है। मैं अपने चित्रों से, अपनी कला से किसी को बेचैन नहीं करना चाहता जबकि कुछ लोग जीवन के नकारात्मक पहलुओं को उभारने को ही सच्ची कला मानते हैं ।
इस अवसर पर कमलनाथ का उत्साहवर्द्धन करने के लिये मौजूद प्रसिद्ध चित्रकार श्री रामशब्द सिंह से भी बातचीत हुई । उनके अनुसार कमलनाथ के चित्र दोनों प्रकार के कलाप्रेमियों को पसन्द आते हैं । जो लोग कला की गहराइयों में उतर कर इन चित्रों की सफलता और महत्ता को आंकते हैं उनको भी और जो पेंटिंग खरीद कर अपने ड्राइंग रूप में सजाना चाहते हैं, उनको भी कमलनाथ प्रभावित करते हैं। कुछ चित्रों को देख कर लगता है कि ये कमलनाथ ने अपने मन की खुशी के लिये बनाये हैं जबकि कुछ चित्रों को देखकर ऐसा आभास होता है कि इस कलाकार ने यह चित्र बनाते समय इस बात का भी ध्यान रखा होगा कि ये चित्र व्यावसायिक रूप से भी सफल हो !
वज़ाहुल हक़ ’काशिफ’ की भावनाओं में भी यही विचार प्रतिध्वनित होते हुए लगते हैं। उनके अनुसार अच्छी कला वही है जो खुशी दे, जिसको देख कर चेहरे पर मुस्कान आये, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को पोषण मिले । उनके अनुसार कमलनाथ की कला इस कसौटी पर खरी उतरती है।
पत्रकार एवं लेखक डा. वीरेन्द्र आज़म के अनुसार कमलनाथ प्रकृति और प्रेम के चितेरे चित्रकार हैं जिनकी पेंटिंग इठलाती भी दिखती है और खिलखिलाती भी ! उनकी पेंटिंग में श्रृंगार भी है, तरुणाई भी, सांझ की लालिमा भी है और अरुणाई भी !
प्रसिद्ध चित्रकार, लेखक, कवि एवं पूर्व वरिष्ठ आई. ए. एस. अधिकारी आर. पी. शुक्ल के शब्दों में - " कमलनाथ वाटर एक्रेलिक व ऑयल पेंटिंग के सिद्धहस्त कलाकार हैं जिन्होंने अपनी रंगों से भरी तूलिका से कैनवस पर जीवन के विभिन्न पक्षों को अभिव्यक्त किया है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की कलात्मक परंपरा से रस ले कर आधुनिकता को भी चित्रित किया है।
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सरकार का कहना है कि लोकपाल बिल पास कराने के लिये समय-सीमा तय करने के लिये कहना उसके साथ बहुत बड़ी ज्यादती है। सरकार का कहना है कि वह इस मामले को 42 वर्षों से लटकाते चले आ रहे हैं और अब अन्ना हैं कि 30 अगस्त तक बिल पास कराना चाहते हैं ! सरकारी काम इस स्पीड से हुआ करते हैं क्या?
सरकार का कहना बिल्कुल सही है। अगर सरकारी कर्मचारी, अधिकारी और मंत्री जनता के काम तुरत-फुरत करने लगें फिर तो हो ली कमाई ! अगर अधिकारी किसी काम को सालों साल तक न लटका कर रखें तो उनकी पूछ ही खत्म हो जायेगी ! दिनों का काम महीनों में और महीनों का काम सालों में करते हैं तब ही तो लोग नोटों के ब्रीफ केस लेकर आगे पीछे घूमते हैं कि “सर, हमारा काम थोड़ा जल्दी करा दीजिये ! ये ब्रीफकेस आपके बच्चों के मिठाई के वास्ते ! ” अगर आवेदन पत्र आते ही स्वीकृति के हस्ताक्षर करने पड़ें तो अफसर और बाबू में फर्क ही क्या रह जायेगा ? सरकारी काम-काज में देरी ही तो वह मूल मंत्र है जिससे पूरा एक भ्रष्ट तंत्र फल-फूल रहा है। न जाने कितने लाख दलालों के परिवार की रोजी रोटी इसी देरी को कम करवाने से चलती है। आप सीधे अफसर या मंत्री को घूस देने का प्रस्ताव नहीं कर सकते । उसके लिये आपको थ्रू प्रोपर चैनल जाना होता है और वह चैनल है दलाल !
आपको ड्राइविंग लाइसेंस चाहिये, राशन कार्ड चाहिये, पासपोर्ट बनवाना हो, अपना ट्रांसफर करवाना हो या रुकवाना हो तो अधिकारियों का काम होता है उसमें यथासंभव फच्चर अड़ाना, कानूनी बारीकियां दिखा कर, आपके प्रार्थनापत्र में बीस नुक्स निकाल कर आपको इधर से उधर, उधर से इधर भटकने के लिये विवश करना । फिर कोई दलाल आपके पास आता है तो आपके ज्ञान चक्षु खुलते हैं कि इतने पैसे देने से सारी कानूनी विवशतायें समाप्त हो जायेंगी और आपके प्रार्थनापत्र पर साब हस्ताक्षर कर देंगे। कई बार लोग अपने विधायक या सांसद के पास जाते हैं कि उनकी चिठ्ठी से काम बन जायेगा पर अफसरों का स्पष्ट मत है कि घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या ! कुछ काम बड़े स्तर के होते हैं जो प्रशासन के स्तर के न होकर शासन के स्तर के होते हैं। इनमें मंत्रियों की अनुकूल टिप्पणी या नीतिगत स्तर पर फैसले की आवश्यकता होती है। यहां आपकी सेवा आपके सांसद और विधायक करते हैं जो आपका काम कराने के लिये ठीक उसी प्रकार जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेते हैं जैसे दलाल लोग करते हैं।
अदालतों में यह दलाली की जिम्मेदारी वकीलों के कंधों पर है। जो जज के मुंहलगे वकील हैं, वह आपका मनपसंद फैसला निश्चित समय सीमा में करा सकते हैं । इसीलिये आज कल मुकद्दमें का फैसला सुरक्षित रखने का फैशन चल पड़ा है। फैसला “सुरक्षित” कर देने के बाद दलालों का काम शुरु होता है, जिस पक्ष का ब्रीफ केस ज्यादा भारी हो, उसका भाग्य संवर जाता है। हफ्ता या महीना इसी काम के लिये दे दिया जाता है।
लोकपाल बिल का भी जहां तक संबंध है, इसमें अन्ना पार्टी को और देश को समझाया जा रहा है कि इसमें बहुत सारी तकनीकियां हैं, विवशतायें हैं, गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता है, सर्वदलीय बैठक होगी, स्टैंडिंग कमेटी इस पर विचार करेगी उसके बाद संसद में इस पर बहस होगी और वोटिंग होगी, बिल पास होगया तो राष्ट्रपति की मंजूरी के लिये जायेगा। उनके स्तर पर भी कई वर्ष लग सकते हैं। यह कोई सांसदों का वेतन तिगुना करने जैसा महत्वपूर्ण मामला थोड़ा ही है कि तीन मिनट में पास करना पड़े ! न कोई स्टैंडिंग कमेटी, न बहस, ना ही वोटिंग ! इधर विधेयक पर निगाह पड़ी और उधर तुरंत पास ! जो मामला बयालीस साल तक प्रतीक्षा कर सकता है, वह बयालीस साल और प्रतीक्षा नहीं कर सकता क्या?
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आस्था है तो बन्द द्वार में भी रास्ता है ! - योगेश छिब्बर !
Usually, parents don’t allow their children to participate in extra-curricular activities for fear of their children getting distracted from studies and not performing well. The children are made to study for hours and hours together . In order to give good results in exams, they are asked to put their hobbies, if there are any, on the shelf and just study.
Those habituated to such stories in almost every home, would find it rather difficult to believe that Aashta Sharma, a student of Class X in Pinewood School, Saharanpur, has no pressure whatsoever from her parents as to what she should do and what she shouldn’t. Have they spoiled their child with so much liberty extended to her? Hell, NO. On the very contrary, Aashta Sharma scored CGPA 10 in her Class X result as per the new CCE system of grading adopted by CBSE. CGPA 10 is granted to those students who score A1 grade in all subjects! Not only Ashtha Sharma is visibly happy with her result, her parents , Principal and the teachers are also also proud of her.
Has she become a bookworm in order to get CGPA 10 grade – the highest given by CBSE? Strangely, the answer is a NO again. Since she does not give more that 5 hours to her studies before or after the school, the law of probability says that if you visit her home, you would find her playing, doing her dance practice or accompanying her parents to some social get together – Lions Club, Bharat Vikas Parishad, Mansi or one of the other social organisations. Since Aastha has been on Zee TV’s Antakshari programme for 3 months’ coming out of it a clear winner, her face is widely recognised and adored among Saharanpurians. If she is with her parents in a cultural program, you may hear her singing a song also, which she is quite good at.
Thus, excelling in various fields – academics, debates, dance, singing she is not only a pride for her family but for the whole of Saharanpur. When thesaharanpur.com asked her to be the BRAND AMBASSADOR for this portal of Saharanpur and campaign for it among youths of Saharanpur, she agreed murmuring a shy thanks.
After the loss of her only brother Siddharth in a fateful road accident one day before Diwali this year, the tragedy could have become a perfectly valid excuse for non-performance in her exams this year. But after seeing her parents in an unenviable dispirited mood, she not decided to recollect herself out of this shattering tragedy but assiduously helped her mom and papa to get over with it and look ahead. For months and months together, there were literally queues of well-wishers – relatives, friends, neighbours, colleagues who rushed to meet and console the family as soon as they heard of the tragic accident and there were neither space nor the mood to concentrate on her studies, yet she scored A1 grade not in one or 2 subjects but in all of them! A herculean effort, indeed. When we paid a visit to congratulate Aastha and her parents, we discussed about her future plans also. Here are the excerpts of what transpired between us.
Question : Heartiest congratulations, Aastha ! your performance is really amazing and heart warming. Hope the result meets your expectations fully?
Aastha Sharma : Yes, I’m very happy for my achievement n to make my family feel proud of me….yes I expected this, though it proved to be an uphill task following the unimaginable tragedy that uk place in our family….
Q. What, according to you, is the secret of staying in the top rung of achievers? Do you study all the day through late nights ? How much time do you devote to your studies?
Aastha Sharma : It is not how much you you read but how much you remember, that counts more. Remembrance improves if concentration is good. Luckily for us, our teachers at school are also our excellent guides. However, self-study also is very important. On an average, I study 5 hrs daily and give continue with my hobbies too.
Q. You are good at almost all the fields - academics, performing arts, oratory. If you were allowed to choose only one of them, which one would you stick to?
Aastha Sharma : Obviously, I would continue with my studies because we can’t survive in today’s world without being properly educated. However, I would pursue my hobbies also even if I have to do practice at my home only.
Q. What subjects do you like most?
Aastha Sharma : Among all the subjects, science fascinates me very much. It offers answers to so many questions about day to day life that keep coming to my mind. It is really interesting if the purpose is to understand the natural phenomenon.
Q. Have you decided about your future plans? Any thoughts given to your career? Which stream are you going to opt in Sr. Secondary?
Aastha Sharma : I have opted Commerce with Maths. There is a lot of scope and so many field open up. I would need less time to achieve my goals than it would take in case I go for Science stream.
Q. Your family had to undergo an unimaginable tragedy recently. How had it affected you? Were you more inclined to your studies or had it sent you off the track for some time?
Aastha Sharma : It had affected me a lot but fate cannot b changed…We still have to continue our life bcoz God is d master of this play in which we all are acting…..there’s a specific time for our roles…..v can’t change it n being my only sibling I was very closely attatched 2 him…v fought,studied together, ,luvd ourselves n even shared our things so his place will olwayz b der in my heart but still this vacuum cannot b filled…..i didn’t get much tym 2 study as this mishappenin tuk place in my winter vacations wich is d only tym fr us 2 prepare n even aftr many months ppl came n went n I ws not in a condition 2 study but I had 2 continue 2 achieve sumthin for my parents wat my brother always wanted….i m thankful for my parents’ support n brother’s guidance n every1’s blessings bcoz of whom I m here 2day n still try my best 2 achieve higher goals in lyf…. J
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सर्वजन के हितों की पार्टी है कांग्रेस: राजबब्बर
सहारनपुर: (सैनी
। कांग्रेस वर्किंग कमैटी के सदस्य व फिरोजाबाद से सांसद राजबब्बर ने आज सहारनपुर के जिला काग्रेंस कार्यालय पर आयोजित पार्टी के कार्यकता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहाकि कांग्रेस सर्वजन की पार्टी है और वह सभी लोगों को हित चाहती है आज के समय कांग्रेस द्वारा चलाई गई योजना मनरेगा ही गरीबों का पेट भरने का काम कर रही है और इसके अलावा अन्य सरकारों ने गरीब जनता को धोखा देकर हमेशा छलने का काम किया है उन्होने कहा कि आज अगर कोई अधिकारी बेईमानी करता है तो समस्त जनता को यह अधिकार है कि वह सूचना के अधिकार के जरिये उससे जानकारी ले सकता है। कांग्रेस की सरकार की ही देन है कि आम आदमी को भी इतना बडा अधिकार दिया गया है। उन्होने कहा कि आने वाला कल कांग्रेस का होगा इसलिए आज जनता उसके साथ जुड रही है उन्होने कहा कि बसपा की सत्ता किसी से छिपी नही है और न ही अन्य पार्टियों का शोषण लोग भूले हैं । उन्होने कार्यकर्त्ताओं को संजीवनी देते हुए कहा कि आज कांग्रेस के युवा कार्यकताओं के दम पर कांग्रेस लगातार आगे बढ रही है । इसलिए युवाओं को चाहिए की वह पार्टी की नीतियों को बढ-चढ कर प्रचारित करें और आम आदमी को पार्टी से जोड़ें तभी पार्टी आगे बढ सकती है ।
बीएड बेरोजगारों ने किया काले झंडे लेकर प्रर्दशन
सहारनपुर
सैनी
। उत्तर प्रदेश स्नातक प्रशिक्षित स्नातक संघ के सदस्यों ने आज बेरोजगारी की समस्या को लेकर क्लैक्टैट के गेट पर प्रर्दशन किया और बसपा सरकार मुर्दाबाद के नारे लगाये और इसके बाद मुख्यमत्री को संबोधित एक ज्ञापन जिला प्रशासन को सौंपा ।
अपने पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार आज बीएड बरोजगारों ने अपनी बेरोजगारी की समस्या को लेकर काले झंडे लेकर प्रर्दशन किया और बीएसपी मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए कहा कि सरकार द्वारा बीएड बेरोजगारों की लगातार अनदेखी की जा रही है वह पिछले काफी समय से प्रर्दशन कर रहे है लेकिन उनकी कोई सुनवाई नही हो रही है जब तक उनकी सुनवाई नही होती तो वे लगातार अपना प्रर्दशन जारी रखेंगे । इसके बाद उन्होने एक ग्यापन भी सौंपा । ज्ञापन सौंपने वालों में जिला अध्यक्ष विजेन्द्र कुमार, अरूण उग्र, नफे सिंह के अलावा भी सैकडों बीएड बेराजगार उपस्थित थे ।
अन्ना के साथ हम सभी भारतीयों की जीत है: आई आई ए
सहारनपुर: (सैनी
। आई आई ए के पदाधिकारियों ने आज अन्ना हजारे की मांगे मान लिये जाने पर अपनी खुशी का इजहार करते हुए मिठाई वितरित की और कहाकि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को रोकने हेतु जो पहल की है। और वह काबिले तारिफ है आखिरकार उसकी सभी मांगों पर सरकार को झुकना पडा है यह सभी भारतीयों की जीत है पहली बार लोग इस मुददे को लेकर इतनी बडी संख्या में जागरूक हुए है और उन्होने अन्ना का साथ दिया है भ्रष्टाचार के मुददे पर आई आई ए ने भी उनका साथ देने की घोषण की थी । इस दौरान काफी संख्या में उद्यमी मौजूद थे ।
गाडा समाज ने समाजवार्दी पार्टी का पुतला फूंका
सहारनपुर: (सैनी
। गाडा युवा मंच के सदस्य आज मल्हीपुर रोड पर स्थित अपने पार्टी कार्यालय पर इकटठा हुए और उन्होने इस अवसर पर समाजवादी पार्टी का पुतला फूंका। उन्होने कहा कि सपा द्वारा जो टिकटों की घोषणा की गई है उसमें कही पर भी गाड़ा समाज के लोगों को टिकट नही दिया है पिछले काफी समय से कुछ चुनिंदा नेता वोटो के नाम पर लोगों को छलने का काम कर रहे है । उन्हाने कहा कि जब सांसद रशीद मसूद अपने भतीजे के लिए टिकट की मांग कर सकते है तो गाडा समाज के लिए क्यो नही मांग सकते है । इस दौरान फरहाद गाडा,मौ अहसान, अनीस गाडा,फारूख गाडा ,महताब, इकरार, शाहिद बिलाल आदि लोग उपस्थित थे ।
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देश में संभवतः ऐसा पहली बार इतनी स्पष्टता के साथ परिलक्षित हुआ है कि निर्वाचित जन-प्रतिनिधि और अफसरशाही कुछ और कानून चाहती है और जनता कुछ और कानून चाहती है। बावजूद इसके कि वर्ष 1968 से टाल-मटोल करते हुए ठंडे बस्ते में डाले जा रहे लोकपाल बिल में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगा सके, हमारे जन-प्रतिनिधि उस डेढ़ टांग के, नख-दंत विहीन लोकपाल बिल को भी कानून न बनने देने के लिये कृत-संकल्प रहे हैं। दूसरी ओर, जनता एक ऐसा कानून चाहती है जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध वास्तव में प्रभावी हो सके और देश को लूट-खसोट से बचा सके।
इससे पहले भी अनेकों बार ऐसा होता रहा है कि हमारे निर्वाचित जन-प्रतिनिधि जनता के व्यापक हित के लिये नहीं, अपितु अपने निहित स्वार्थों की रक्षा के लिये, अपना व्यक्तिगत हित संवर्द्धन करने के लिये कानून बनाते रहे हैं। शाहबानों का मामला हो, इंदिरा गांधी को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय रहा हो, समान नागरिक संहिता को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अनुशंसा हो, चुनाव प्रणाली में व्यापक सुधारों के लिये व अपराधियों को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराये जाने के लिये दिये गये सुझाव हों, हमारे निर्वाचित जन-प्रतिनिधि, विशेषकर सत्तासीन राजनीतिबाज कानून के विरोध में खड़े दिखाई देते रहे हैं। न्यायपालिका की आवाज़ को भी एक सुर से नकारते रहे हैं। ऐसा कोई भी प्रयास वह सफल नहीं होने देना चाहते जिससे उनके नाक में नकेल पड़ने की आशंका हो।
जनता यह भी देखती चली आ रही है कि हमारे सांसद व विधायक जब चाहे, जितना चाहे, अपना वेतन व भत्ते बढ़ा लेते हैं और इसके लिये उनको कोई आंदोलन भी नहीं करना पड़ता। बस, आज मन कर गया कि वेतन तीन गुना होना चाहिये तो कानून बना लिया कि आज से वेतन तीन गुना और भत्ते दस गुना मिलेंगे। सो सिंपल ! पहले पांच वर्ष तक सांसद और विधायक के रूप में कार्य करने के बाद ही पेंशन मिलती थी, मन आया और कानून बना लिया कि “नहीं, एक दिन के लिये सांसद / विधायक बनने के बाद भी पेंशन मिला करेगी !” सो सिंपल !
हमारे देश में विधायक / सांसद बनने के लिये भारत का नागरिक होना और पच्चीस वर्ष की आयु का होना पर्याप्त है इसके अतिरिक्त और कोई योग्यता नहीं चाहिये। सांसद या विधायक हेतु चुनाव तो आप जेल में पड़े-पड़े भी लड़ सकते हैं। दूसरी ओर चपरासी बनने के लिये भी अच्छे चरित्र का होना और कम से कम आठवीं तक की शिक्षा तो होनी ही चाहिये। यदि चुनाव आयोग या अन्य कोई संस्था इस दिशा में कुछ सुधार के उपाय सुझाये तो सारे राजनीतिक दल उसका विरोध करने लगते हैं। हमारे जन-प्रतिनिधियों को अपने ऊपर कोई भी अंकुश नहीं चाहिये। उनके कुछ विशेषाधिकार हैं सो अलग ! उनको अनेकों मामलों में कानूनी संरक्षण (इम्यूनिटी) मिला हुआ है।
इन सारी विकृतियों को कौन दूर करेगा? जनता या ये जन-प्रतिनिधि? तवलीन सिंह कहती हैं (अमर उजाला – 10 अप्रैल) कि कानून में परिवर्तन सिर्फ जन-प्रतिनिधि करेंगे। कानून बनाना जनता का काम नहीं है, सांसदों व विधायकों का है। पर सवाल तो यही है कि सांसदों, विधायकों और अफसरशाहों को नियंत्रण में रखने के लिये, उनके भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिये कानून भी क्या वे खुद ही बनाना चाहेंगे ? आज तक तो उन्होंने ऐसा कुछ किया नहीं है! इसके सर्वथा विपरीत उन्होंने तो इस राह में हर प्रकार से रोड़े ही अटकाये हैं। फिर, उनको कैसे नियंत्रित किया जायेगा?
एक निर्वाचित प्रतिनिधि किस प्रकार का कानून बनाना चाहेगा ? स्वाभाविक रूप से, सबसे पहले तो वह यह चिन्ता करेगा कि ऐसा कानून बनाया जाये जो अगली बार के चुनाव में भी उसकी जीत पक्की हो सके। एक व्यक्ति करोड़ों रुपये खर्च करके चुनाव लड़ता है (और हर बार चुनाव आयोग द्वारा तय की गई चुनावी खर्च की सीमा को कम बताते इसमें और बढ़ोतरी भी चाहता है) तो क्या इसलिये कि उसे कानून बनाने का बहुत तजुर्बा है, योग्यता है और वह देश हित में कानून बनाना चाहता है? हा-हा-हा ! जी नहीं, वह करोड़ों रुपये इसलिये खर्च करता है कि अगले पांच वर्षों में इतना कमा सके कि अगली सात पुश्तों तक का जुगाड़ हो जाये। सारी ज़िन्दगी के लिये मोटी पेंशन बंध जाये, और माननीय कहलाये सो अलग !
तवलीन सिंह कहती हैं कि यदि आप जन-लोकपाल कानून बनवाना चाहते हैं तो उसे कानून मंत्री को दीजिये, वह बनायेंगे कानून ! कानून बनाना जनता का काम नहीं है। बिल्कुल ठीक कहा तवलीन सिंह ने। पर 1968 से अब तक बनाया क्यों नहीं ? और अब भी, दिसंबर से अब तक अन्ना हज़ारे और उनके साथी प्रधान मंत्री, गृह मंत्री, कानून मंत्री, नेता प्रतिपक्ष, सी.पी.आई., सी.पी.एम., लोकसभाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति, विभिन्न राजनीतिक दलों के अध्यक्षों से मिल कर यही सारे प्रयास तो कर रहे थे। प्रधानमंत्री को छः चिठ्ठी भेजीं जो वह हज़म कर गये और डकार तक नहीं ली। गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने टका सा जवाब देकर वापिस लौटा दिया । सोनिया गांधी ने मिलने का समय तक नहीं दिया । सत्ता प्रतिष्ठान में बैठा हर व्यक्ति यही सोचता रहा कि भौंक रहे हैं, भौंकने दो!
वैसे तवलीन सिंह की जानकारी के लिये बता देना उचित होगा कि लोकतंत्र की वर्तमान पद्धति पर आकर मानव बुद्धि की सीमा समाप्त हो जाती हो, ऐसा नहीं है। “राजा खुद कानून बनाये” - यह तरीका तात्विक दृष्टि से सरासर गलत है। कानून बनाना ऐसे विद्वानों का काम है जो संत मनोवृत्ति के हों, पूरे देश के व्यापक हित में, आने वाली पीढ़ियों के व्यापक हित में सोच सकने लायक बुद्धि व मनोवृत्ति रखते हों । हमारे जन-प्रतिनिधि भले ही देश की संसद में या प्रदेश की विधान सभा में बैठते हों, पर उनकी सोच तो निहायत बौनी है। वह अपने परिवार और अपने स्वयं के हित साधने के बाद, सिर्फ अपने चुनाव क्षेत्र, अपने वोट बैंक और अपने चन्दा दाताओं का हित साध सकते हैं, इससे अधिक उनसे अपेक्षा करना मूर्खता ही है। भारत में कानून बनाने की जिम्मेदारी जंगलों में रह कर शिक्षा व ग्यान की खोज में लगे रहने वाले ऋषियों – मुनियों की रही है जो स्वयं कुटिया बना कर, धन-वैभव, सत्ता से दूर पठन-पाठन में लीन रहते थे। राजा का काम सिर्फ कानून का शासन स्थापित करना हुआ करता था, कानून बनाना राजा की जिम्मेदारी नहीं थी।
आज हमारे देश में लोकतंत्र है जिसमें जन-प्रतिनिधियों को ही कानून बनाने हैं तो हमें अपने जन-प्रतिनिधियों पर इतना अंकुश रखना तो सीखना ही होगा कि वह देशवासियों को लूट-खसोट कर अपने स्विस खातों में धन जमा न करने लगें। हमें इतनी व्यवस्था तो करनी ही होगी कि वह अपने हित की, अपने आगामी चुनाव की, अपने चन्दा दाताओं की चिन्ता कम करें और पूरे देश की चिंता ज्यादा करना सीखें। ममता बैनर्जी जैसी नेताओं को सिखाना होगा कि वह पूरे देश की रेल मंत्री हैं, न कि सिर्फ पश्चिम बंगाल की। बिहार में व्यापक नर-संहार के बाद जब मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से कहा गया था कि आपको वहां जाना चाहिये तो उनका उत्तर था – “हम उहां कूं जायें, ऊ का हमका वोट देवत हैं !!!!“ इतनी घटिया, निकृष्ट सोच रखने वाले जन-प्रतिनिधियों के भरोसे तवलीन सिंह बैठना चाहें तो उनको रोका नहीं जा सकता, वह स्वतंत्र हैं। पर यह देश और अब इसकी जाग उठी जनता अपने जन-प्रतिनिधियों की नाक में नकेल डाले बिना शांत बैठने वाली नहीं है। अपराधियों, भ्रष्टाचारियों को जेल तक पहुंचाने का, उनकी समस्त संपत्ति जब्त करने का कानून हमें अविलम्ब चाहिये। यही नहीं, हमें नाकारा, भ्रष्ट जन-प्रतिनिधियों को वापिस बुलाने का अधिकार भी चाहिये और चुनाव में खड़े सभी अपराधियों को रिजेक्ट करने का विकल्प भी चाहिये ।
तवलीन जी, सच तो यह है कि देशवासियों के मन में अपने जन-प्रतिनिधियों के प्रति इतना अधिक गुस्सा, क्षोभ और अविश्वास किसी के भी हित में नहीं है पर अगर आज ऐसा है तो इसका दोष मूलतः हमारे जन-प्रतिनिधियों और उनको चुनने की हमारी व्यवस्था का ही है। आज केवल भ्रष्ट लोग ही चुनाव लड़ सकते हैं, जीत सकते हैं । चुनाव लड़ने के लिये ईमानदार आदमी करोड़ों रुपये कहां से लायेगा और भला क्यों खर्च करेगा? इस सारी भ्रष्ट व्यवस्था को अन्ना हज़ारे के पीछे खड़ी जनता की अदम्य ताकत के भरोसे ही बदला जा सकता है। अन्ना हज़ारे स्वयं में कोई ताकत नहीं हैं, वह तो जनता के क्षोभ रूपी तूफान की नभ-स्पर्शी लहरों पर सवार एक नाविक हैं जो उस क्षोभ जनित ऊर्जा को भ्रष्ट व्यवस्था में परिवर्तन हेतु उपयोग कर रहे हैं।
सुशान्त सिंहल
संपादक, द सहारनपुर डाट काम
संदर्भ – तवलीन सिंह का 10 अप्रैल का आलेख ( अमर उजाला)
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सहारनपुर: वर्ष 1947 के आस-पास जन्में जिन लोगों ने देश की आज़ादी की लड़ाई नहीं देखी थी या जिनको उस वक्त की कोई घटना याद नहीं, वह सब लोग आजकल देश में आज़ादी की दूसरी लड़ाई लड़ी जाती देख सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय देश में गोरी चमड़ी वाले अंग्रेज़ों का राज था और आजकल देश में काली चमड़ी वाले अंग्रेज़ों का राज है। वह भी देश को लूटने-खसोटने के लिये आये थे, यहां का धन समेट कर अपने देश ले जाते थे और ये काले अंग्रेज़ भी देश वासियों को लूट – लूट कर सारा धन विदेशी बैंकों में भेज रहे हैं । उस समय उन गोरी चमड़ी वालों से मुक्ति दिलाने के लिये क्रांति का बीज बोया गया था, गरम दल के क्रांतिकारियों और नरम दल के नेता महात्मा गांधी की अगुआई में देश ने लड़ाई लड़ी थी, और इस बार भी देश को लूट खसोट कर खा रहे इन काले अंग्रेज़ों से मुक्ति के लिये देश की जनता को अन्ना हज़ारे के रूप में एक संत मिल गया है जो उनकी अगुआई करने के लिये तत्पर है। इन भ्रष्ट काले अंग्रेज़ों के शर्मनाक कारनामों से पूरा देश किस बुरी तरह से संत्रस्त है इसका अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि अन्ना हज़ारे व कुछ सौ अन्य सहयोगियों द्वारा जन्तर-मंतर पर आमरण अनशन करने का समाचार देखते ही देखते पूरे देश में जंगल की आग की भांति फैल गया और देश को भ्रष्टाचार से बचाने के लिए नगर-नगर व गांव - देहात की जनता अन्ना हजारे के समर्थन व सहयोग के लिये स्वतःस्फूर्त भाव से सडको पर उतर आई है। व्यापारी, चिकित्सक, उद्यमी, कलाकार, व्यवसायी, छात्र, नौकरी पेशा लोग, महिलायें, पुरुष - हर कोई उत्साह से सराबोर है और इन भ्रष्टाचारियों को, काले अंग्रेज़ों को ठीक से सबक सिखाने के लिये उतावला हो रहा है। सरकार में बैठे हुए इन काले अंग्रेज़ों की हर चन्द कोशिश है कि किसी प्रकार से यह आंदोलन समाप्त हो जाये और उनका काला धंधा बदस्तूर चलता रह सके पर जनता ने भी ठान लिया है कि अभी नहीं तो कभी नहीं ! भ्रष्टाचार के सबसे बड़े संरक्षक के रूप में खुद इस देश के प्रधानमंत्री को देखा जा रहा है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस लड़ाई में काले अंग्रेज़ों की इस सरकार के मुखिया सरदार मनमोहन सिंह को केवल पांच दिन के भीतर घुटने टेकने पड़ गये - यह देखकर पूरे देश में दीवाली जैसा माहौल दिखाई दे रहा है, इंडिया गेट पर और हर शहर के मुख्य मार्गों पर लोग जुलूस की शक्ल में घूमते दिखाई दे रहे हैं, बधाइयों का आदान प्रदान हो रहा है। हर किसी को कांग्रेस सरकार की इस पराजय को देख कर लंका पर विजय का दृश्य आंखों के सम्मुख कौंध रहा है। वैसे भी क्रिकेट के वर्ल्ड कप में आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और अंततः श्रीलंका पर विजय के बाद जनता का एड्रेनलिन का स्तर पहले से ही बहुत अधिक बढ़ा हुआ है। आज की अन्ना हज़ारे की इस विजय को वर्ल्ड कप की प्राप्ति से भी कहीं अधिक उत्साह जनक माना जा रहा है। अधिकारियों और सरकार के मंत्रियों के हौंसले पस्त हैं, चेहरों पर हवाइयां उड़ रही हैं।
देश की जनता को अपनी चुनी हुई सरकार को ही नीचा दिखा कर, अपने प्रधानमंत्री को और उनके सहयोगी मंत्रियों को अपमानित होता हुआ देख कर हार्दिक आह्लाद की अनुभूति हो रही हो, इससे बड़ा दुर्दिन कांग्रेस के नेताओं के लिये और कोई नहीं हो सकता था। यह विडंबना ही कही जा सकती है कि जिनसे नायक बन कर देश को नेतृत्व देने की उम्मीद जनता ने लगाई थी, वे जनता को लूटने – खसोटने और काली कमाई से अपना घर भरने वाले, आने वाली सौ पुश्तों का प्रबन्ध करने की इच्छा रखने वाले खलनायक साबित हुए।
जहां तक सहारनपुर नगर का प्रश्न है, यहां पर भी उत्साह का वही माहौल हर ओर दिखाई दे रहा है । अधिकारियों और नेताओं को छोड़ दें तो अपने अपने स्तर पर हर किसी ने इसमें सहभागिता की है। आज व्यापारियों ने घंटाघर चौक पर भ्रष्टाचार का पुतला फूंकते हुए कहाकि देश से भ्रष्टाचार को मिटाना है तो अन्ना हजारे का साथ देना होगा । आर्य जाट समाज कल्याण समिति के सदस्यों ने भी हकीकतनगर धरना स्थल पर धरना देते हुए कहाकि हमे देश के लिए व अपने व अपने बच्चों के भविष्य के लिए लडना होगा तभी हमारा देश तरक्की कर सकता है उन्हाने कहा कि आज के समय में अन्ना जैसे समाज सुधारको की आवश्यकता है और उनका साथ इस मुहिम के लिए देना होगा तभी हमारा भ्रष्टाचार मुक्त का सपना साकार हों सकता है । उधर महामंडलेश्वर बाबा रिजकदास ने भी एक प्रेसवार्ता का आयोजन करके यह ऐलान किया है कि इस लडाई में वह अन्ना हजारे के साथ हैं। उधर आज दीवानी कचहरी में वकीलों ने भी अपने कार्य से विरत रहकर अन्ना हजारे के समर्थन में गेट पर ही धरना दिया और कहा कि जब तक उनकी मांगे नही मानी जाती तो वे उनके साथ है।
शिवसेना ने फूंका शाहिद आफरीदी का पुतला
सहारनपुर
सैनी
शिव सेना के सदस्यों ने आज गांधी पार्क से कोर्ट रोड होते हुए एक प्रर्दशन मार्च किया औी कलैक्टेट तिराहे पर पाकिस्तानी कप्तान का पुतला फूंका । योगेन्द्र सिरोही ने कहाकि शाहीद आफरीदी के भारत के खिलाफ ब्यान देना सही नही है उनहोने कहा कि उन्हे ब्यान देने से बाज आना चाहिए । जहां पहले वे भारत में किस प्रकार ब्यान देकर गये ; लेकिन पाकितस्तान में उन्हाने भारत के खिलाफ ग्यान दिया है शिवसेना इसे किसी सूरत में बर्दाश्त नही करने वाली है अगर उन्होने भारत से माफी नही मांगी तो शिवसेना का आंदोलन जारी रहेगा ।
अधिकारों के सडको पर उतरी महिलाएं
सहारनपुर: (सैनी
अपने अधिकारो की रक्षा के लिए आज हजारों की संख्या में महिलाएं सडको पर उतरी और और मांगों को लेकर एक ज्ञापन जिला प्रशासन को सौंपा ।
महिला अधिकार मंच की अध्यक्ष पुनाता गौतम के नेत्तव में आज हजारों महिलाएं गांधी पार्क में इकटठा हुई और उसके बाद इन्होने घंटाघर होते कोर्ट रोड से कचहरी तक प्रर्दशन किया इसके बाद उन्होने आपनी मांगों के जिला प्रशासन को एक ज्ञापन दिया जिसमें उन्हाने कहाकि आज महिलाओं का उत्पीडन चरम सीमा पर है और मनरेगा में अधिकारियों की मिलीभगत से घोटाला किया जा रहा है जो लोग काम पर भी आते है उनकी उपस्थिति दिखाकर सरकार का मोटा धन हडपा जा रहा है अगर इसी प्रकार गरीबों का धन हडपा जाता रहा तो एक दिन सभी महिलाएं सउको पर होंगी जिस की जिम्मेदारी शासन प्रयासन की होगी ।
कमिश्नर कायार्लय पर किसानों का धरना लगातार जारी
सहारनपुर: (सैनी
कमिश्नर कार्यालय पर बकाया गन्ना मूल्य प चीनी मिलों द्वारा ब्याज दिये जाने और बिजली के खंभों का किसानों को उचित मुआवजा दिये जाने की मांग को लेकर धरना जारी है किसान नेता व फारमर्स फोरम के अध्यक्ष योगेश दहिया का कहना है जब तक किसानों को उचित मुआवजा नही मिलता है तो उनका धरना जारी रहेगा इससे पहले भूमि अध्याप्ति अधिकारी व गन्ना अधिकारी उनकी कई दौर की वार्ता हो चुकी है लेनिक कोई समाधान नही हो पा रहा है ये तो भूमि अध्याप्ति अधिकारी भी मानते है कि मुआवजा किसानों के लिए कम है लेकिन उनका कहना है कि वे अपने अधिकरों से बंधे नियमानुसार कार्य करना उनका कर्तव्य है । किसानों का कहना है कि जब तक उनकी मांगे नही मानी जाती तो धरना देते रहेंगे ।
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यदि सरकार के लिये प्रजा बच्चों के समकक्ष है तो जो सिद्धान्त बच्चों के लिये सही है वह प्रजा के लिये भी सही माना जाना चाहिये। बच्चों के सही लालन-पालन के बारे में जब बात की जाती है तो एक सिद्धान्त बार – बार दोहराया जाता है कि बच्चा कुछ मांगे और उसकी वह मांग जायज़ हो तो उस मांग को एक बार में ही पूरा कर दिया जाना चाहिये और यदि वह मांग नाजायज़ हो तो बच्चे के रोने-धोने, धमकी देने आदि से डरे बिना उसे स्पष्ट कर देना चाहिये कि यह मांग नाजायज़ है अतः पूरी नहीं हो सकती।
यही आदर्श स्थिति सरकार और जनता के बीच में भी होनी चाहिये। जनता के बीच में से कहीं से कोई मांग उठे, कोई प्रार्थना या अपील की जाये तो सरकार को उसे फौरन गंभीरता से सुनना चाहिये और यदि वह मांग, प्रार्थना या अपील उचित व स्वीकार करने योग्य है तो उसे तुरन्त मान लिया जाना चाहिये और यदि अनुचित है तो किसी भी प्रकार के आन्दोलन, बल-प्रदर्शन, हड़ताल, घेराव, धरने से बिना डरे सरकार द्वारा स्पष्ट कर दिया जाना चाहिये कि मांग किसी भी स्थिति में पूरी नहीं होगी।
जिस परिवार व समाज में इस प्रकार की संवेदनशील व्यवस्था हो वहां बच्चा ही नहीं, जनता भी बड़ी जल्दी समझ जाती है कि गलत बात को लेकर जिद करने से कोई लाभ नहीं होता क्योंकि वह कभी मानी नहीं जाती है। पर हमारे देश में आज़ादी के बाद से कांग्रेस सरकारों ने यह शर्मनाक परम्परा विकसित की है कि जनता की किसी भी जायज़ मांग को भी वर्षों तक लटकाये रहो, आंदोलन होने दो, और जब मामला बिलकुल सर से ऊपर निकलने लगे तो एहसान पटकते हुए उस मांग को पूरा कर दो और उसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास करो। हमारी कांग्रेस सरकारें जनता को यह आभास देती रही हैं कि मांग कितनी भी जायज़ हो, बिना आंदोलन या हड़ताल के पूरी नहीं की जायेगी और आंदोलन करने, दबाव डालने पर हर जायज़ - नाजायज़ मांग को भी पूरा कराया जा सकता है। स्वाभाविकतः ऐसे में हमारे देश में हर रोज़ कहीं न कहीं धरने – प्रदर्शन हड़ताल होते ही रहते हैं। कभी सड़कों पर जाम लगाये जाते हैं, कभी रेल की पटरियों पर बोरिया – बिस्तर बिछा कर लेटा जाता है, अधिकारियों की घेरा बंदी की जाती हैं, कभी फैक्टरियों और मिलों में, सार्वजनिक वाहनों व भवनों में तोड़-फोड़ की जाती है। किसी को भी यह पता लगाना असंभव सा हो जाता है कि कौन सी मांग मांगे जाने लायक है और कौन सी नाजायज़ है। सबको बस इतना पता होता है कि जिसमें सरकार को झुकाने लायक दम-खम है, वह झुका सकता है। मांग गलत है या सही है इसके कतई कोई महत्व नहीं है।
सरकार के स्तर पर जिस संवेदन हीनता का परिचय दिया जाता रहा है, उसी कुशिक्षा को हमारे देश के नियोक्ताओं ने भी जस-का तस ग्रहण कर लिया है। भारत के सरकारी, गैर – सरकारी संस्थानों के कर्मचारियों को अक्सर जापान का उदाहरण देते हुए शिक्षा दी जाती है कि वहां कभी भी हड़ताल के कारण काम बन्द नहीं किया जाता। काली पट्टी बांह पर बांध कर कर्मचारी काम करें तो इसका अर्थ यह माना जाता है कि उनकी कुछ मांगें हैं जिन पर सुनवाई अपेक्षित है। जापान में यदि जूता फैक्टरी में हड़ताल की नौबत आये तो कर्मचारी एक ही पैर के जूते बनाते चले जाते हैं ताकि कंपनी दबाव अनुभव करे पर फैक्टरी में काम बन्द नहीं किया जाता है। पर जापान का उदाहरण देने से पहले क्या यह विचारणीय नहीं है कि वहां काली पट्टी बंधी देखते ही लेबर इंस्पेक्टर पन्द्रह मिनट में सुनवाई हेतु हाजिर हो जाता है और कर्मचारियों की मांग पर पूरी सदाशयता के साथ विचार विमर्श होता है ! भारत में जैसी संवेदन हीन व्यवस्था है यहां तो सारी ज़िन्दगी काली पट्टी बांधे रहो, तो भी सुनवाई नहीं होने वाली है।
सरकारी स्तर पर पुष्पित – पल्लवित हुई इसी संवेदनहीनता की यह पराकाष्ठा ही तो थी कि हमारे प्रधानमंत्री स. मनमोहन सिंह सामान्य शिष्टाचार को पूरी तरह से तिलांजलि देते हुए एक या दो नहीं, बल्कि अन्ना हज़ारे व सिविक सोसायटी द्वारा लिखे गये छः पत्रों को हज़म कर गये और पत्र प्राप्ति की सूचना देना भी गवारा नहीं किया, उस पर कार्यवाही करना तो दूर की बात है। जिन लोगों ने इन पत्रों पर हस्ताक्षर किये थे, वे देश के अति सम्मानित नागरिक हैं। यदि स. मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री के रूप में यह निकृष्ट रवैया है कि देश के कुछ विशिष्ट नागरिक उनको छः पत्र लिखें और वह उनको इस अंदाज़ में लें कि “भौंकने दो, कुत्ते तो भौंकते ही रहते हैं !” तो आम जनता की किस स्तर पर और कहां सुनवाई होगी, यह कल्पना ही दुष्कर है। अन्ना हज़ारे व उनके साथियों द्वारा देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, कानून मंत्री, सत्तारूढ़ पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपराष्ट्रपति, लोकसभा स्पीकर, नेता प्रतिपक्ष आदि से संपर्क किया गया या करने की चेष्टा की गई और जब कोई सार्थक परिणाम सामने आता दिखाई नहीं दिया तो अन्ततः अन्ना हज़ारे ने जन्तर मन्तर पर आमरण अनशन करने की ठान ली। अनशन की खबर सुनते ही सरकार के मुखिया और मंत्रियों के पांवों तले जमीन खिसक गई। चिन्ता यह नहीं थी कि आमरण अनशन से अन्ना हज़ारे के जीवन को खतरा है। (उसकी तो सरकार को कोई चिन्ता नहीं थी – अन्ना यदि कल के मरते आज मर जायें, मनमोहन सिंह की बला से !) चिन्ता थी तो ये कि यह अनशन एक जन-आंदोलन की शक्ल ले लेगा तो पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में कांग्रेस की लुटिया पूरी तरह से डूब जायेगी। इस डिसास्टर कंट्रोल के लिये सरकार द्वारा अपने बड़बोले मंत्री कपिल सिब्बल को जिम्मेदारी दी गई कि अन्ना को किसी तरह से पटाओ और अनशन समाप्त कराओ ।
देश की जनता का जहां तक संबंध है, वह एक के बाद एक खुलते घोटालों और उसमें शामिल भारी भरकम राशि के बारे में जान कर स्तब्ध है और इस भ्रष्ट व्यवस्था से मुक्ति चाहती है। नेताओं और अधिकारियों की विश्वसनीयता अब शून्य पर नहीं, बल्कि नकारात्मक स्तर पर है। खुद सरकार के मुखिया ईमानदार और शरीफ कहे जाने वाले प्रधानमंत्री स. मनमोहन सिंह कहें कि दोपहर का एक बजा है तो देश की जनता अपनी घड़ी देख कर पुष्टि अवश्य करना चाहेगी कि वास्तव में एक ही बजा है या नहीं । विश्वास का यह संकट देश की सबसे बड़ी विडंबना बन चुका है और साथ ही खतरा भी । यदि जनता अपने नेतृत्व के प्रति ही विश्वास खो चुकी है तो इससे बड़ी विडंबना और कुछ नहीं हो सकती।
हमारी सरकार अब अन्ना हज़ारे द्वारा आरंभ किये गये इस अनशन से और उससे भी बढ़ कर, देश के कोने – कोने से जनता जिस प्रकार अन्ना द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध छेड़ी गई इस मुहिम के साथ लाखों – करोड़ों की संख्या में तेजी से जुड़ती चली जा रही है उसे देख कर बहुत सारे मंत्रियों और अधिकारियों की पैंट ढीली होने लगी हैं तो इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है। देश की स्वतंत्रता से लेकर आज तक ये लोग कायदे कानून को धता बताते हुए देश की छाती पर मूंग दलते चले आरहे हैं। कहने को कानून की निगाह में छोटा- बड़ा, गरीब – अमीर सब बराबर है, पर व्यवहार में इससे बिल्कुल उलट होता चला आया है। जो जितने बड़े पद पर आसीन है, कानून उतना ही अधिक उसकी मुठ्ठी में है। देश में ऐसी एक भी संस्था नहीं है जो इन सफेदपोश भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे अपराधियों को उनके अपराधों की जांच करने व उनको सजा दे सकने में सक्षम हो। अन्ना हज़ारे की मांग भी यही है कि 1968 से ठंडे बस्ते में डाला जा रहा लोकपाल विधेयक न सिर्फ तुरन्त प्रभावी किया जाये बल्कि उसमें आवश्यक संशोधन करते हुए उसे इतना शक्तिशाली बनाया जाये कि लोकपाल प्रधानमंत्री, मंत्री व सभी सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध बिना किसी भय या दबाव के जांच करने में व सजा दे सकने में सक्षम हो। यह मांग जनता को भी भा रही है और देश के कोने कोने से इस मांग को समर्थन दिया जा रहा है।
यदि स. मनमोहन सिंह की सरकार ने सिविक सोसायटी और अन्ना हज़ारे द्वारा पिछले वर्ष प्रधानमंत्री को विचारार्थ भेजे गये जन-लोकपाल मसौदे को सम्मान की निगाहों से देखा होता और उनको विचार-विमर्श हेतु आदर सहित बुलाया होता तो इससे सरकार की सदाशयता प्रकट होती, भ्रष्टाचार से लड़ने की उनकी इच्छा भी जाहिर होती । पर मनमोहन सिंह ने ऐसा न करते हुए अपराधियों और भ्रष्टाचारियों को बचाने व उनका साथ देने को अधिक महत्व दिया और अन्ना हज़ारे द्वारा उनको प्रेषित किये गये जन-लोकपाल विधेयक को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया। आज सरदार मनमोहन सिंह के चेहरे पर कालिख पुत रही है, उनको भ्रष्टाचारियों का सबसे बड़ा संरक्षक माना जारहा है तो इसके लिये और कोई नहीं वह स्वयं जिम्मेदार हैं। उनके अन्दर इतना आत्मबल ही नहीं है कि – “ये ले अपनी लकुटि कमरिया, तूने बहुत ही नाच नचायो” कह कर भ्रष्टाचारियों से पल्ला झाड़ सकें ।“ अब अगर अन्ना के अनशन के और उनके साथ जुड़ रही भारत की जनता के कोप के भय से वह उसी जन लोकपाल विधेयक को रद्दी की टोकरी में से वापिस निकाल कर, साफ – सूफ करके उस पर अपने हस्ताक्षर करने के लिये मज़बूर हो रहे हैं तो यही कहा जा सकता है कि १०० जूते भी खा लिये और १०० प्याज भी खानी पड़ गईं । काश समय पर ही समझदारी दिखाई होती ।
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“No brilliant student in India should be denied the opportunity to pursue professional studies for want of financial means.” Well, none would perhaps disagree with the above statement full of idealism but if we ask, “how to achieve this great ideal?” most of us would either fall silent or may throw the ball in Government’s court. Isn’t it?
But there are people of Saharanpur who have taken it as their pious mission to transform the lives of academically brilliant but economically poor / under-privileged students in India by providing to them yearly scholarship to the tune of Rs.25,000/- p.a. to assist them while they sail through their 4-5 years of studies in some government engineering or medical college.
This philanthropic activity is continuing silently since 1994 without expecting any laurels from public or the government, without any expectations for some Bharat Ratna, Padma Vibhushan or even a simple bouquet from anyone. A hefty amount of USD 6 million has already been invested in the future of India by these people who haven't severed their emotional ties with their small, dusty home town in Saharanpur or their country.
The million dollar question that must be in your minds must be: Who these people are? and where are they? Well, the answer came from Dr. Pawan Kumar Bansal, who is the coordinator of Foundation For Excellence India Trust for the whole Uttar Pradesh. The trust was set up by a handful of people from Gangoh – now living and working in U.S. for the last several decades. Preferring to remain away from limelight themselves, they have delegated the authority of searching suitable candidates for scholarship from U.P. who fulfil the two norms laid out for being the recipient of this scholarship. Firstly, the family income should be less than Rs.1,20,000 per annum;and, secondly, the candidates should have been selected for engineering / medical undergraduate course in govt. quota i.e. on the basis of merit. The scholarship will continue year after year till the course is completed if the examination results remain satisfactory. Caste of the candidate is no consideration at all.
Dr. P.K. Bansal, Principal of Pooranmal Ramlal Degree College, Gangoh has been asked by the Foundation to look for more and more candidates from U.P. who deserve to be helped by the Foundation. In fact, the Foundation finding that not enough number of applications are being received, has asked Dr. Bansal to shoulder this responsibility to spread the word around and invite more and more applications.
So dear friends, if you know of someone who fulfils above norms and is desirous of availing this facility, please let him / her parents know so that they would get in touch with Dr. P.K. Bansal between 11 a.m. and 2 p.m. at his landline phone 0132-2711590. Alternatively, you may write to us at thesaharanpur@gmail.com for the attention of FFEI. We will pass on the requests/quesries/applications to Dr. Bansal the very same day of receiving them.
Hasn’t Saharanpur given birth to great people indeed? This only reinforces our belief: EAST OR WEST –SAHARANPUR IS THE BEST !