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यदि सरकार के लिये प्रजा बच्चों के समकक्ष है तो जो सिद्धान्त बच्चों के लिये सही है वह प्रजा के लिये भी सही माना जाना चाहिये। बच्चों के सही लालन-पालन के बारे में जब बात की जाती है तो एक सिद्धान्त बार – बार दोहराया जाता है कि बच्चा कुछ मांगे और उसकी वह मांग जायज़ हो तो उस मांग को एक बार में ही पूरा कर दिया जाना चाहिये और यदि वह मांग नाजायज़ हो तो बच्चे के रोने-धोने, धमकी देने आदि से डरे बिना उसे स्पष्ट कर देना चाहिये कि यह मांग नाजायज़ है अतः पूरी नहीं हो सकती।
यही आदर्श स्थिति सरकार और जनता के बीच में भी होनी चाहिये। जनता के बीच में से कहीं से कोई मांग उठे, कोई प्रार्थना या अपील की जाये तो सरकार को उसे फौरन गंभीरता से सुनना चाहिये और यदि वह मांग, प्रार्थना या अपील उचित व स्वीकार करने योग्य है तो उसे तुरन्त मान लिया जाना चाहिये और यदि अनुचित है तो किसी भी प्रकार के आन्दोलन, बल-प्रदर्शन, हड़ताल, घेराव, धरने से बिना डरे सरकार द्वारा स्पष्ट कर दिया जाना चाहिये कि मांग किसी भी स्थिति में पूरी नहीं होगी।
जिस परिवार व समाज में इस प्रकार की संवेदनशील व्यवस्था हो वहां बच्चा ही नहीं, जनता भी बड़ी जल्दी समझ जाती है कि गलत बात को लेकर जिद करने से कोई लाभ नहीं होता क्योंकि वह कभी मानी नहीं जाती है। पर हमारे देश में आज़ादी के बाद से कांग्रेस सरकारों ने यह शर्मनाक परम्परा विकसित की है कि जनता की किसी भी जायज़ मांग को भी वर्षों तक लटकाये रहो, आंदोलन होने दो, और जब मामला बिलकुल सर से ऊपर निकलने लगे तो एहसान पटकते हुए उस मांग को पूरा कर दो और उसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास करो। हमारी कांग्रेस सरकारें जनता को यह आभास देती रही हैं कि मांग कितनी भी जायज़ हो, बिना आंदोलन या हड़ताल के पूरी नहीं की जायेगी और आंदोलन करने, दबाव डालने पर हर जायज़ - नाजायज़ मांग को भी पूरा कराया जा सकता है। स्वाभाविकतः ऐसे में हमारे देश में हर रोज़ कहीं न कहीं धरने – प्रदर्शन हड़ताल होते ही रहते हैं। कभी सड़कों पर जाम लगाये जाते हैं, कभी रेल की पटरियों पर बोरिया – बिस्तर बिछा कर लेटा जाता है, अधिकारियों की घेरा बंदी की जाती हैं, कभी फैक्टरियों और मिलों में, सार्वजनिक वाहनों व भवनों में तोड़-फोड़ की जाती है। किसी को भी यह पता लगाना असंभव सा हो जाता है कि कौन सी मांग मांगे जाने लायक है और कौन सी नाजायज़ है। सबको बस इतना पता होता है कि जिसमें सरकार को झुकाने लायक दम-खम है, वह झुका सकता है। मांग गलत है या सही है इसके कतई कोई महत्व नहीं है।
सरकार के स्तर पर जिस संवेदन हीनता का परिचय दिया जाता रहा है, उसी कुशिक्षा को हमारे देश के नियोक्ताओं ने भी जस-का तस ग्रहण कर लिया है। भारत के सरकारी, गैर – सरकारी संस्थानों के कर्मचारियों को अक्सर जापान का उदाहरण देते हुए शिक्षा दी जाती है कि वहां कभी भी हड़ताल के कारण काम बन्द नहीं किया जाता। काली पट्टी बांह पर बांध कर कर्मचारी काम करें तो इसका अर्थ यह माना जाता है कि उनकी कुछ मांगें हैं जिन पर सुनवाई अपेक्षित है। जापान में यदि जूता फैक्टरी में हड़ताल की नौबत आये तो कर्मचारी एक ही पैर के जूते बनाते चले जाते हैं ताकि कंपनी दबाव अनुभव करे पर फैक्टरी में काम बन्द नहीं किया जाता है। पर जापान का उदाहरण देने से पहले क्या यह विचारणीय नहीं है कि वहां काली पट्टी बंधी देखते ही लेबर इंस्पेक्टर पन्द्रह मिनट में सुनवाई हेतु हाजिर हो जाता है और कर्मचारियों की मांग पर पूरी सदाशयता के साथ विचार विमर्श होता है ! भारत में जैसी संवेदन हीन व्यवस्था है यहां तो सारी ज़िन्दगी काली पट्टी बांधे रहो, तो भी सुनवाई नहीं होने वाली है।
सरकारी स्तर पर पुष्पित – पल्लवित हुई इसी संवेदनहीनता की यह पराकाष्ठा ही तो थी कि हमारे प्रधानमंत्री स. मनमोहन सिंह सामान्य शिष्टाचार को पूरी तरह से तिलांजलि देते हुए एक या दो नहीं, बल्कि अन्ना हज़ारे व सिविक सोसायटी द्वारा लिखे गये छः पत्रों को हज़म कर गये और पत्र प्राप्ति की सूचना देना भी गवारा नहीं किया, उस पर कार्यवाही करना तो दूर की बात है। जिन लोगों ने इन पत्रों पर हस्ताक्षर किये थे, वे देश के अति सम्मानित नागरिक हैं। यदि स. मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री के रूप में यह निकृष्ट रवैया है कि देश के कुछ विशिष्ट नागरिक उनको छः पत्र लिखें और वह उनको इस अंदाज़ में लें कि “भौंकने दो, कुत्ते तो भौंकते ही रहते हैं !” तो आम जनता की किस स्तर पर और कहां सुनवाई होगी, यह कल्पना ही दुष्कर है। अन्ना हज़ारे व उनके साथियों द्वारा देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, कानून मंत्री, सत्तारूढ़ पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपराष्ट्रपति, लोकसभा स्पीकर, नेता प्रतिपक्ष आदि से संपर्क किया गया या करने की चेष्टा की गई और जब कोई सार्थक परिणाम सामने आता दिखाई नहीं दिया तो अन्ततः अन्ना हज़ारे ने जन्तर मन्तर पर आमरण अनशन करने की ठान ली। अनशन की खबर सुनते ही सरकार के मुखिया और मंत्रियों के पांवों तले जमीन खिसक गई। चिन्ता यह नहीं थी कि आमरण अनशन से अन्ना हज़ारे के जीवन को खतरा है। (उसकी तो सरकार को कोई चिन्ता नहीं थी – अन्ना यदि कल के मरते आज मर जायें, मनमोहन सिंह की बला से !) चिन्ता थी तो ये कि यह अनशन एक जन-आंदोलन की शक्ल ले लेगा तो पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में कांग्रेस की लुटिया पूरी तरह से डूब जायेगी। इस डिसास्टर कंट्रोल के लिये सरकार द्वारा अपने बड़बोले मंत्री कपिल सिब्बल को जिम्मेदारी दी गई कि अन्ना को किसी तरह से पटाओ और अनशन समाप्त कराओ ।
देश की जनता का जहां तक संबंध है, वह एक के बाद एक खुलते घोटालों और उसमें शामिल भारी भरकम राशि के बारे में जान कर स्तब्ध है और इस भ्रष्ट व्यवस्था से मुक्ति चाहती है। नेताओं और अधिकारियों की विश्वसनीयता अब शून्य पर नहीं, बल्कि नकारात्मक स्तर पर है। खुद सरकार के मुखिया ईमानदार और शरीफ कहे जाने वाले प्रधानमंत्री स. मनमोहन सिंह कहें कि दोपहर का एक बजा है तो देश की जनता अपनी घड़ी देख कर पुष्टि अवश्य करना चाहेगी कि वास्तव में एक ही बजा है या नहीं । विश्वास का यह संकट देश की सबसे बड़ी विडंबना बन चुका है और साथ ही खतरा भी । यदि जनता अपने नेतृत्व के प्रति ही विश्वास खो चुकी है तो इससे बड़ी विडंबना और कुछ नहीं हो सकती।
हमारी सरकार अब अन्ना हज़ारे द्वारा आरंभ किये गये इस अनशन से और उससे भी बढ़ कर, देश के कोने – कोने से जनता जिस प्रकार अन्ना द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध छेड़ी गई इस मुहिम के साथ लाखों – करोड़ों की संख्या में तेजी से जुड़ती चली जा रही है उसे देख कर बहुत सारे मंत्रियों और अधिकारियों की पैंट ढीली होने लगी हैं तो इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है। देश की स्वतंत्रता से लेकर आज तक ये लोग कायदे कानून को धता बताते हुए देश की छाती पर मूंग दलते चले आरहे हैं। कहने को कानून की निगाह में छोटा- बड़ा, गरीब – अमीर सब बराबर है, पर व्यवहार में इससे बिल्कुल उलट होता चला आया है। जो जितने बड़े पद पर आसीन है, कानून उतना ही अधिक उसकी मुठ्ठी में है। देश में ऐसी एक भी संस्था नहीं है जो इन सफेदपोश भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे अपराधियों को उनके अपराधों की जांच करने व उनको सजा दे सकने में सक्षम हो। अन्ना हज़ारे की मांग भी यही है कि 1968 से ठंडे बस्ते में डाला जा रहा लोकपाल विधेयक न सिर्फ तुरन्त प्रभावी किया जाये बल्कि उसमें आवश्यक संशोधन करते हुए उसे इतना शक्तिशाली बनाया जाये कि लोकपाल प्रधानमंत्री, मंत्री व सभी सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध बिना किसी भय या दबाव के जांच करने में व सजा दे सकने में सक्षम हो। यह मांग जनता को भी भा रही है और देश के कोने कोने से इस मांग को समर्थन दिया जा रहा है।
यदि स. मनमोहन सिंह की सरकार ने सिविक सोसायटी और अन्ना हज़ारे द्वारा पिछले वर्ष प्रधानमंत्री को विचारार्थ भेजे गये जन-लोकपाल मसौदे को सम्मान की निगाहों से देखा होता और उनको विचार-विमर्श हेतु आदर सहित बुलाया होता तो इससे सरकार की सदाशयता प्रकट होती, भ्रष्टाचार से लड़ने की उनकी इच्छा भी जाहिर होती । पर मनमोहन सिंह ने ऐसा न करते हुए अपराधियों और भ्रष्टाचारियों को बचाने व उनका साथ देने को अधिक महत्व दिया और अन्ना हज़ारे द्वारा उनको प्रेषित किये गये जन-लोकपाल विधेयक को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया। आज सरदार मनमोहन सिंह के चेहरे पर कालिख पुत रही है, उनको भ्रष्टाचारियों का सबसे बड़ा संरक्षक माना जारहा है तो इसके लिये और कोई नहीं वह स्वयं जिम्मेदार हैं। उनके अन्दर इतना आत्मबल ही नहीं है कि – “ये ले अपनी लकुटि कमरिया, तूने बहुत ही नाच नचायो” कह कर भ्रष्टाचारियों से पल्ला झाड़ सकें ।“ अब अगर अन्ना के अनशन के और उनके साथ जुड़ रही भारत की जनता के कोप के भय से वह उसी जन लोकपाल विधेयक को रद्दी की टोकरी में से वापिस निकाल कर, साफ – सूफ करके उस पर अपने हस्ताक्षर करने के लिये मज़बूर हो रहे हैं तो यही कहा जा सकता है कि १०० जूते भी खा लिये और १०० प्याज भी खानी पड़ गईं । काश समय पर ही समझदारी दिखाई होती ।
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सहारनपुर : पूर्व सभासद कलीम अहमद के नेतृत्व में बड़ी मस्ज़िद नूरबस्ती के निकट निरंतर फैल रही गन्दगी को लेकर विशाल प्रदर्शन किया गया व नगर निगम मुर्दाबाद के नारे लगाये गये। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच दिनों से नाला बन्द होने की सूचना नगर निगम तक पहुंचाने के बावजूद नगर निगम के सोते पड़े रहने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के माथे पर जूं तक नहीं रेंगती है जिसे लेकर नगरवासियों में आक्रोश की स्थिति रहती है।
नूरबस्ती की नालियों की पिछले दो वर्षों से सफाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए क्षेत्र वासियों ने नगर निगम के नाकारा अधिकारियों व कर्मचारियों को खूब कोसा और कहा कि जिलाधिकारी को २७ फरवरी को यहां की स्थिति दिखाई गई थी, पर उसके बावजूद भी आज तक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।
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Saharanpur (20 Jan.) It’s different !
There is something in-built in this city that makes is unique and a leader. While the entire state is just watching the Banda rape case in which BSP leader Purushuottam Dwivedi and three more of his accomplices have been charge-sheeted with the charges of raping Sheelu –the BSB leader’s domestic help, Saharanpur has taken a step forward and has offered the rape-victim Sheelu and her family protection and assistance by way of a home, financial and legal help to fight the long legal battle against the mighty BSP leader.
On behalf of recently configured Mahanagar Shanti Surakhsha Samiti its office bearers Ambrish Gupta, Advocate and Alpana Talwar, Advocate announced their decision to extend financial and legal help to Sheelu and her family. According to Mr. Gupta, Sheelu has been at the receiving end in the present insensitive political, social and administrative set up. Even the SSP and DM of Banda are being looked at as perpetrators of atrocities against this poor lady. Mr. Gupta and his Mahanagar Shanti Suraksha Samiti have decided to earmark a flat valued at Rs. 8 lacs for victims like Sheelu. Not only this, Rs. 2 lacs have been fixed deposited and the interest income accrued over this deposit will be used to offer sustenance to these victims.
Alpana Talwar, while talking to the scribes further charged the administrative machinery of Banda of working under the coercive influence of BSP politicians and disclosed her resolve of requesting the DM of Banda through the DM of Saharanpur to offer to Sheelu’s family this help from Saharanpur. She terms these incidents as highly unfortunate and said that such victims need protection and all sort of legal help would be provided to them. Not only this, efforts are being made to offer a home for destitute – especially children by the Samiti for which financial help has already started pouring in.
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While Dr. Dinish Chandra is gone, BJP is the biggest loser in this episode. While on one hand, the "credit" of getting Dr. Dinesh Chandra Singh transferred to Allahabad has gone to BSP leaders and not to the BJP, the BJP leader and city MLA Raghav Lakhanpal is being severely criticised for being instrumental in causing this lathi charge on the agitators.
"Think before you speak" say the people of great wisdom. This is something our City MLA also has to learn. His use of abusive words for Dr. Dinesh Chandra Singh is despicable and paints a very shabby picture of this political leader. One may only hope and wish that he utters words more carefully in future.
Those agitators of BJP who suffered from injuries may find solace in the fact that there won't be any criminal proceedings against any of them. So, even if the "credit of getting Mr. Dinesh Chandra" could not go to them, they just have to worry about their fractures and nothing else. FIRs lodged against them are reportedly being withdrwawn. Congratulations to them.
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So, the state has finally buckled under the political pressure exerted by various trade organisations of Saharanpur - agreeing to transfer Ex-City Magistrate Dinesh Chandra and has decided to replace him with Mr. Harish Chandra from Allahabad.
Transfer of an officer from one city to another is nothing extra ordinary except when it is done to appease certain group of individuals as has happened in this case. This group had made it a prestige issue and political leaders, finding something in it for them too, jumped into the fray. So, when political heavyweights exerted pressure on the govt., our weak-kneed political system, as usual, succumbed to it.
While Saharanpurians say adieu to Dr. Dinesh Chandra Singh and thank him for his untiring efforts to bring some sense of law and order in the mind of general public, we also hope that Mr. Harish Chandra would be equally determined to bring to book the encroachers, profiteers, counterfeiters and criminals moving around in white clothes. Let all the good steps taken by Dinesh Chandra continue in the new regimen too. We don't find any coloured plastic in the market now and the credit goes to Dr. Dinesh Chandra Singh for this phenomenon - which is something new for Saharanpur.
While confrontational approach won't go far, it is also true that LIVE AND LET OTHERS LIVE approach adopted towards criminals and anti-social elements also won't benefit the society. So, the new officer has to tread his path carefully. We welcome him into Saharanpur.
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इस खेल में भाजपा को कांग्रेस को अपना गुरु बनाना चाहिए !
आजकल सहारनपुर में भाजपा एक कपड़ा व्यापारी भूषण गांधी की ह्रदय गति रुक जाने से हुई मौत को मुद्दा बना कर अपना खोया जनाधार वापिस पाने का जुगाड़ करने में लगी हुई है और इसके लिए मोहरा बनाया जा रहा है – सिटी मजिस्ट्रेट डा. दिनेश चंद्र सिंह को जिनको भाजपा के आंदोलन के चलते अब सिटी मजिस्ट्रेट के स्थान पर अपर आयुक्त बनाया गया है| कल भाजपा ने कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया जिसमें पुलिस द्वारा लाठी चार्ज किया गया |
अमर उजाला की रिपोर्ट को यदि प्रमाण मानें तो कल के बवाल की सारी जिम्मेदारी नगर विधायक राघव लखन पाल शर्मा के सर पर आती है जिन्होंने जानबूझ कर माइक पर वह सब बातें कहीं जो किसी भी वरिष्ठ और गंभीर किस्म के नेता के मुख से कभी भी नहीं निकलनी चाहियें | उन्होंने डा. दिनेश चन्द्र सिंह के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए पुलिस व् प्रशासन को उकसाया, भड़काया और लाठी चार्ज को मानो खुद आमंत्रित किया| अमर उजाला ने राघव लखन पाल को उद्दृत करते हुए लिखा है – “ये पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट इतना ढीठ है कि इसका पुतला पेट्रोल डालने पर भी नहीं जल रहा |” हमारे माननीय भाजपा विधायक का अगला वाक्य था – “अपर आयुक्त ने अपने तीन लोग जुलूस में भेज रखे हैं उन्होंने ही डी एम की गाड़ी में पत्थर मारा है|” इसके बाद राघव लखन पाल ने कहा – “जहां भी ये सिटी मजिस्ट्रेट दिनेश चंद्र दिखाई देगा, व्यापारी इसकी अच्छी तरह से छिताई करेंगे|” अमर उजाला का कहना है कि भाजपा नेता द्वारा यह कहने के तुरंत बाद माइक छीन लिया गया और लाठी चार्ज आरम्भ हो गया |
हमारा मानना है कि यदि भाजपा को भूषण गांधी की दुखद मृत्यु को इस्तेमाल करते हुए अपनी राजनीति चमकानी ही थी तो दिवंगत व्यापारी की अंतिम यात्रा वाले दिन ही यह कार्य होना चाहिए था | कांग्रेस इस मामले में भाजपा को सिखा सकती है कि किसी नेता की मौत पर जन-सहानुभूति का ज्वार कैसे पैदा किया जाता है और कैसे उसे वोटों में तब्दील किया जाया है | शव यात्राओं के दूर दर्शन और रेडियो पर सीधे प्रसारण और कमेंटरी की कांग्रेस को जितनी महारत हासिल है वह आश्चर्य जनक है | शव यात्रा चाहे महात्मा गांधी की हो, इंदिरा गांधी की हो, राजीव गांधी की हो उसका इस्तेमाल जन-भावनाओं को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए कांग्रेस बखूबी करती चली आई है|
परन्तु लगता है कि भाजपा के पास इतने कुशल राजनीतिज्ञ नहीं हैं| भाजपा की वर्तमान पौध में तो वरुण गांधी और राघव लखन पाल हैं जिनके भाषण ही इतने विवादास्पद हो जाते हैं कि अदालत में इन भाषणों को किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता है|
दिवंगत व्यापारी भूषण गांधी के परिवार से हमें विशेष रूप से सहानुभूति हो रही है| जैसे पति-पत्नी के बीच में यदि वकील आ जाए तो फिर मामला दंपत्ति के हाथ से निकल कर वकील के हाथ में आ जाता है, वकील मुकद्दमा जीतने के लिए विरोधी पक्ष पर जितने घटिया और गलीज़ आरोप लगा सकता है, लगाता है, अपने गवाहों से झूठे बयान दिलवाता है, वैसे ही भूषण गांधी की दुखद मौत अब भाजपा के लिए एक मुद्दा है जिसमे उसका अपना स्वार्थ जुड चुका है| अब अगर व्यापारी का परिवार चाहे भी तो भाजपा इस मामले को शांत नहीं होने देगी | परन्तु जिस भोंडे ढंग से राजनीति खेली जा रही है, उससे जनता की सहानुभूति भाजपा के साथ आती दिखाई नहीं दे रही | आगे क्या होगा यह भविष्य ही बताएगा |
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सहारनपुर में आजकल कुछ लोग सिटी मजिस्ट्रेट दिनेश चन्द्र सिंह को हटाने की मांग कर रहे हैं। आरोप है कि सिटी मजिस्ट्रेट के साथ रायवाला क्षेत्र के व्यापारियों की नोक-झोंक हुई थी और उस दौरान एक व्यापारी भूषण गांधी का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। इस दुःखद और असामयिक निधन के बहाने से व्यापारियों का एक समूह एवं कुछ भाजपाई नेता सिटी मजिस्ट्रेट के पीछे हाथ धोकर पड़ गये हैं और उनको यह अच्छा मौका नज़र आ रहा है कि इसी बहाने इस अति सक्रिय और कर्तव्यपरायण अधिकारी से मुक्ति पाई जाये जो कभी पॉलिथिन और पर्यावरण के नाम पर, कभी घटतौली के नाम पर और कभी अतिक्रमण हटाने के नाम पर व्यापारियों की नाक में दम किये रहता है।
उल्लेखनीय है कि पिछले एक दो वर्षों में सिटी मजिस्ट्रेट दिनेश चन्द्र सिंह ने एक ओर अपने मधुर व्यवहार, हंसमुख स्वभाव से और दूसरी ओर शहर के अपराधियों के प्रति कठोरता का परिचय देकर सामान्य जन के बीच में अपने लिये एक विशेष स्थान बनाया है। कभी नकली दवा निर्माताओं के खिलाफ, कभी घटतौली करने वाले दुकानदारों के खिलाफ, कभी खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वाले व्यापारियों के खिलाफ, कभी पांवधोई गंगा नदी में कूड़ा - कचरा फेंकने वाले दुकानदारों के खिलाफ सिटी मजिस्ट्रेट संघर्ष का बिगुल बजाते ही रहते हैं। इस अति सक्रियता के चलते लोग उनको निवर्तमान कमिश्नर आर.पी. शुक्ल का सच्चा उत्तराधिकारी मानने लगे हैं जिन्होंने इसी प्रकार से नगर की अनेकानेक समस्याओं के निराकरण हेतु दिन-रात प्रयास किये थे।
ऐसे में यह तो स्वाभाविक ही है कि अपनी इस कर्तव्यपरायणता और प्रशासनिक कुशलता के चलते, जहां एक ओर सिटी मजिस्ट्रेट दिनेश चन्द्र नगर की जनता के मध्य लोकप्रियता हासिल करते चले गये हैं वहीं दूसरी ओर वे सब व्यापारी उनसे बहुत दुःखी हैं, संत्रस्त हैं जो अपनी गैर-कानूनी और समाज विरोधी हरकतों को आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं। व्यापारी श्री भूषण गांधी के निधन को बहाना बना कर आजकल कुछ व्यापारी सिटी मजिस्ट्रेट से मुक्ति पाने का अभियान छेड़े बैठे हैं और भाजपा नेता उनकी वकालत में आगे आ रहे हैं। यह सरासर अनुचित है, अनावश्यक है और अनुत्तरदायित्वपूर्ण है। सच तो यह है कि इससे इन व्यापारियों का कुछ भला भी नहीं होने वाला है। पहली बात तो यह कि जनता हर उस अधिकारी को पसन्द करती है जो कर्तव्य परायण है, अपने क्षेत्र की समस्याओं के हल के लिये, न्याय और कानून व्यवस्था के पालन के लिये हर समय तत्पर दिखाई देता है। ऐसे अधिकारी उंगलियों पर गिनने लायक हैं और जब सहारनपुर को ऐसा कोई अधिकारी मिलता है तो जनता उसे सिर - आंखों पर बैठा लेती है। आर.पी. शुक्ल को सहारनपुर वासियों से जितना स्नेह, सम्मान और आदर मिला उसके पीछे उनकी कर्तव्यपरायणता और समाज के कष्टों के प्रति उनकी संवेदनशीलता और उन कष्टों को हरने की उनकी भावना ही तो थी। आज युवा अधिकारी दिनेश चन्द्र सिंह हमारे बीच में हैं जो आर.पी. शुक्ल की परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं।
दूसरी बात ये कि दिनेश चन्द्र को हटाने से क्या होने वाला है? आज एक कर्तव्यपरायण सिटी मजिस्ट्रेट को हटाने में आप सफल हो भी गये तो कल कोई दूसरा आ जायेगा । अगर वह दिनेश चन्द्र से भी अधिक सख्त और कर्तव्यपरायण हुआ तो? तब हमारे शहर के अतिक्रमण कर्ता व्यापारी क्या करेंगे ? उसे हटाने की भी जुगत भिड़ायेंगे ? पर फिर तीसरा - चौथा - पांचवा आयेगा !
सच तो यह है कि जब जनता जाग जाती है तो अपने प्रशासनिक अधिकारियों से उनकी अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं और हमारे अधिकारियों को उन अपेक्षाओं पर खरा उतरना का नैतिक दबाव बन जाता है। जो भी अधिकारी अच्छे कार्य करेगा, वह जनता के स्नेह और सम्मान का पात्र बन जायेगा । आज पांवधोई आन्दोलन का संचालन कर रहे जिलाधिकारी आलोक कुमार का गुणगान करने वाले लाखों में हैं । पर कुछ व्यक्ति ऐसे भी अवश्य होंगे जिनके निहित स्वार्थों को जिलाधिकारी द्वारा चलाये जा रहे इस जन-आंदोलन के कारण चोट पहुंच रही है, वह सब मन ही मन जिलाधिकारी से खार खाये बैठे होंगे और मन ही मन दुआ कर रहे होंगे कि ये जिलाधिकारी इस जिले से जाये और कोई ऐसा आ जाये जो अपनी सीट पर बैठ कर ऊंघता रहे।
भाजपा के लिये भी यह आत्म-चिंतन का समय है। नगर की किसी भी समस्या के प्रति भाजपा में कभी भी कोई सक्रियता नज़र नहीं आती, बस कुछ गिने चुने चेहरे भाजपा में शेष रह गये दिखाई देते हैं जिनका जन मानस पर प्रभाव शून्य है। क्या भाजपा का यही लक्ष्य है ? क्या इसी मार्ग पर चलते हुए भाजपा लोकप्रियता हासिल करने के स्वप्न देख रही है?
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Dear Prashant / Nakli Singh,
While I am delighted to see that our honourable readers have at last started airing their views, I find myself disagreeing on certain points with them.
1. Since there are many problems in our society, how does it undervalue taking up one of the grave problems for sorting it out for once and for all ? If the administration would have taken up some other problem in its hand, we would be cursing them for not caring for the river ! This attitude reminds me of the story of a husband and wife. The wife gifted two shirts to her husband. Next day morning, the husband wore one of the shirts with great pleasure. However, the wife commented, "So, you didn't like the other one !"
You are worried about the roads. In the last twenty days, I have seen three roads completely rebuilt - Madhav Nagar > Garhi Malook > Bajoria Marg, Gopal Nagar > Jail Chungi, and of course, the Court Road. Many more must have been built in other parts of Saharanpur too. So, I don't feel that nothing is being done to revamp the roads.
2. There have been many raids on various sweet / Namkeen sellers and samples have been taken. If our good-for-nothing judiciary takes decades and decades to deliver justice, what can admn. do in such matter ?
3. Who is spitting on the roads ? Administrative officers? During last one year, at least 200 garbage bins have been placed on the roads but people are still throwing garbage near the dustbin and not into the dustbin. Who is to be blamed for that ?
4. Violation of traffic is something our Saharanpur police must address itself to.
5. Bribery and corruption should be stopped at high places first. If our ministers are corrupt, this corruption trickles down at lower levels too. We should not punish a chaprasi for taking 10 rupees if we cannot throw his boss for taking 1 crore rupees as a bribe behind the bars. I think a DM is not empowered to send a minister behind the bar for taking bribe.
6. In my opinion our Saharanpur police is good for nothing. Chain snatching is not such a big deal that cannot be stopped. But either our police officers are totally imcompetent or ignorant or both.
7. Paondhoi river project + polythene ban are two such things which have been taken up by the administration enthusiastically. We must support our officers for their untiring efforts in this field. Polythene ban has been really implemented for the very first time in Saharanpur and I find even the subzi walas not using coloured carrybags. However, the public is not taking cotton bags to the market while shopping. We still expect the shopkeepers to give us the merchandise in poly bags only. Polluting vehicles are a menace for the society but as I said earlier, our police is only interested in money and nothing else.
8. People are washing their cars for hours together with the drinking water. Railway has got an overhead tank in Govind Nagar which is overflowing since decades. We expect our members to take it up as their sacred duty to spread awareness about it.
9. Who is stealing the elctricity - the DM ? Such thiefs should be sent behind the bars alongwith those politicians who distribute unlimited free electricity to their vote banks.
10. Establishment of Medical college is already in progress in Saharanpur. There are a large number of Engg. colleges in Saharanpur which are worried very much because there are not enough number of admissions. They may have to close down because Break Even Point is not achievable in near future.
11. Railway is sitting over the project of flyover at Sharda Nagar crossing. I don't find much railway crossings in the city requiring over-bridges.
12. If some officer is asking for money, try to catch him red - handed through sting operation. Even after that, the courts would spend decades before a decision would be given.
13. Please give us more information about such people who get Rs. 15/- per month and have become crorepati.
Dear friends, criticism for the sake of criticism won't lead us anywhere. To tell you the truth, I have been very harsh critic of the DM till a few months back and didn't have much respect for him till he devoted himself to the cause of Paondhoi cleaning. When I saw his enthusiasm and dedication exhibited by his daily presence on the banks of the river along with his deputies; when I saw him plunging deep into the mud and the silt - enthusing others to follow him, I found myself respecting him very much. I had opportunity to discuss for hours together various problems of Saharanpur with him and the uninhibited exchange of views between us has been eye-opener for both of us. While he has been thankful for sharing with him knowledge of grim state of affairs on the roads, I also had a chance to see his view point. It is really very easy to criticise people but very difficult to do things ourselves without leaving any chance of criticism.
I could not appreciate Prashant's outburst - "What the hell DM is doing...... " If Prashant and you really want to know what the DM Alok Kumar is doing, I can take you to at least 30 households who have constructed septic tanks in their houses on the instructions of DM Alok Kumar. Mr. Alok Kumar visited each of these homes and pursuaded them to stop their sewer outlet going into the river and build a septic tank immediately. I can show Prashant and to Mr. Nakli Singh at least 500 saplings planted by DM and his team members. They visit again and again to check if the saplings are still growing or not ! How many saplings have you planted, by the way ?
Cordially,
Sushant Singhal
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प्रिय मित्रों,
१- क्या आपने सहारनपुर की ट्रैफिक पुलिस को कभी तेज गति वाहन चालकों का चालान करते देखा है? हां / नहीं / ध्यान नहीं
२- क्या आपको मालूम है कि सहारनपुर में ’नो एंट्री ज़ोन’ कहां - कहां हैं ? हां / नहीं / ध्यान नहीं
३- यदि सहारनपुर में कहीं ’नो एंट्री ज़ोन हैं’ तो क्या आपने किसी को उसमें प्रवेश करने से रोके जाते हुए देखा है? हां / नहीं / ध्यान नहीं
४- क्या आपने वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करने के लिये किसी वाहन-चालक का चालान होते देखा है ? हां / नहीं / ध्यान नहीं
५- क्या आपने शहर में प्रेशर हॉर्न इस्तेमाल करने पर किसी वाहन चालक का चालान होते आज तक कभी देखा है? हां / नहीं / ध्यान नहीं
६- क्या आपने दोपहिया वाहनों पर तीन या चार सवारियों को जाते अक्सर देखा है ? हां / नहीं । क्या ऐसे वाहन चालकों का कभी चालान किया जाते हुए देखा है ? हां / नहीं / ध्यान नहीं
७- क्या आपने शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले वाहन-चालक का चालान होते हुए कभी देखा है? हां / नहीं / ध्यान नहीं
८- क्या आपने ट्रैक्टर ट्रॉलियों का किसी भी बात के लिये चालान कटते हुए कभी देखा है? हां / नहीं / ध्यान नहीं
९- क्या आपने सड़कों, विशेषकर हाई वे पर ग्रामीण बच्चों को खेलते हुए देखा है? हां / नहीं / ध्यान नहीं
१०-क्या आपने ट्रैक्टर ट्रॉलियों के पीछे आम तौर पर रिफ्लेक्टर लगे हुए देखे हैं? हां / नहीं / ध्यान नहीं !
११- क्या ट्रैक्टर ट्रॉली चालकों के पास भारी वाहन चलाने हेतु लाइसेंस होता है ? हां / नहीं / मालूम नहीं !
१२- क्या आपने सहारनपुर में, गलत ढंग से ओवरटेक करने पर किसी का चालान होते हुए कभी देखा या सुना है? हां / नहीं / ध्यान नहीं !
१३- क्या आपने छोटे बच्चों को स्कूटर / मोटर साइकिल / कार चलाते हुए कभी देखा है? हां / नहीं / ध्यान नहीं ! क्या आपने कभी इनको या इनके माता-पिता या अभिभावक को सजा दिये जाते कभी देखा है? हां / नहीं / ध्यान नहीं
१४- क्या सहारनपुर में वाहन चालक का लाइसेंस कड़ी परीक्षा के बाद मिलता है ? हां / नहीं / मालूम नहीं !
१५- क्या सहारनपुर में वाहन-चालक का लाइसेंस दलालों के माध्यम से घर बैठे बैठे बनवाया जा सकता है ? हां / नहीं / मालूम नहीं !
१६- क्या आपके विचार से, सहारनपुर की जनता को ट्रैफिस सैंस है ? हां / नहीं / शायद नहीं
१७- क्या आपने ट्रैफिक पुलिस कर्मियों को कभी सड़क पर वाहनों से अवैध उगाही करते हुए देखा है? हां / नहीं / ध्यान नहीं
१८- क्या ऐसा कोई समाचार सुना या पढ़ा है कि किसी ट्रैफिक पुलिस कर्मी को अवैध उगाही करने के कारण सस्पेंड किया गया हो / लाइन हाजिर किया गया हो या नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया हो ? हां / नहीं / ध्यान नहीं
१९- आप सहारनपुर की पुलिस को कर्तव्यपरायणता के लिये १० में से कितने नंबर देना चाहेंगे? ____
२०- आप सहारनपुर की पुलिस को ईमानदारी के लिये १० में से कितने नंबर देंगे ? _____
२१- क्या आप इस बात से सहमत हैं कि हर रोज़ अखबारों में वाहन दुर्घटनाओं के बारे में पढ़ते-पढ़ते हम अब संवेदनशून्य हो चुके हैं और इस बारे में ज्यादा सोच - विचार केवल तब करते हैं जब दुर्घटना में मरने वाला कोई हमारा परिचित या संबंधी या प्रमुख व्यक्तित्व हो ? हां / नहीं
२२- क्या आप इस बात से सहमत हैं कि अपराधी को अपराध करने पर तुरंत सजा मिले तो शेष नागरिकों को भी अपराध से दूर रहने की प्रेरणा मिलती है? हां / नहीं । क्या हमारे देश में अपराधियों को तुरंत दंड देने की व्यवस्था है ? हां / नहीं / मालूम नहीं ।
यदि आप अपने विचार विस्तार पूर्वक व्यक्त करना चाहेंगे तो हमें अत्यन्त प्रसन्नता होगी ! कृपया अपने विचार अपने संक्षिप्त परिचय व पासपोर्ट आकार के रंगीन चित्र के साथ हमें ईमेल से भेजें - info@sushantsinghal.com
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सहारनपुर में यातायात व्यवस्था - कुछ सुझाव
सहारनपुर उत्तर प्रदेश के उन अभागे नगरों में से एक है जहां हर रोज़, हर चौराहे पर ट्रेफिक जाम लगते हैं और यातायात नियंत्रक कहीं दूर - दूर तक नज़र नहीं आते। ट्रेफिक जाम क्यों लगते हैं इसके कारणों में जायें तो कुछ कारण दीर्घकालिक मिलेंगे और कुछ तात्कालिक कारण हैं ।
दीर्घकालिक कारण का जहां तक प्रश्न है - नगर व जिला प्रशासन से यह अपेक्षा की जाती है कि निरंतर बढ़ रही जनसंख्या / वाहन संख्या को देखते हुए कई वर्ष पहले से ही सड़क निर्माण व यातायात नियमन की योजनायें बनाई जायेंगी ताकि सड़क नेटवर्क का प्रयोग करने वालों की संख्या में निरंतर हो रही वृद्धि के अनुसार उपलब्ध सुविधाओं का भी विस्तार होता रहे। आज सहारनपुर के ट्रेफिक की जो दयनीय स्थिति है और यातायात नियंत्रक जिबस किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में खड़े हैं उसे देख कर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि समय रहते ऐसी कोई भी योजना या तो बनी ही नहीं या फिर उसका क्रियान्वयन नहीं हो सका जिससे सड़क यातायात हेतु उपलब्ध सुविधाओं का विस्तार हो सकता । वैकल्पिक मार्गों का निर्माण, सड़क का चौड़ीकरण, पुल, फ्लाईओवर आदि का निर्माण ऐसे ही कुछ कार्य हैं जो रातों रात नहीं किये जा सकते। इनके लिये पहले से ही व्यवस्था करनी होती है।
इसके अतिरिक्त प्रशासकों को कुछ कठिन व अरुचिकर निर्णय भी लेने होते हैं जो व्यापक जनहित में होते हैं परन्तु निर्णय लेते समय समाज के कुछ हिस्से को बुरा लगता है, असुविधा अनुभव होती है पर दीर्घकाल में हर किसी को उसका लाभ ही होता है। रेलवे स्टेशन की बगल से बस-स्टैंड को नगर के बाहर किसी स्थान पर स्थानांतरित किये जाने की बात दसियों साल से विचाराधीन है पर इस पर अमल आज तक नहीं हो सका। बस अड्डे के कारण रेलवे रोड पर जो दुरवस्था है, वह तो है ही, पर जिन बसों को शहर की सड़कों पर घुसना ही नहीं चाहिये था, वह सब देहरादून रोड, अंबाला रोड, दिल्ली रोड, चकरौता रोड पर यातायात संकुलन (traffic congestion) व दुर्घटनाओं का कारण बन रही हैं। इसी प्रकार ट्रांसपोर्ट नगर शहर से चार किमी दूर बन जाने के बावजूद आज तक उसे बसाया नहीं जा सका। कुछ सहारनपुर विकास प्राधिकरण की लापरवाही व लालफीताशाही और कुछ ट्रांसपोर्टरों के निहित स्वार्थ व पुरानी जगह पर ही कार्य करते रहने की इच्छा । जमे-जमाये कारोबार को दूसरी जगह लेकर जाना जितने दिन टाला जा सके, टाला जा रहा है। यदि दिल्ली में आज भी अकेला ISBT काश्मीरी गेट पर होता और वहां की सरकार आनन्द विहार तथा सराय काले खां पर बस अड्डे बनाने से बचती रहती तो आज दिल्ली का क्या हाल होता ? मैट्रो रेल का निर्णय जब लिया गया तो इसे शेखचिल्ली के ख्वाब जैसा बताने वाले विरोधी हज़ारों-लाखों की संख्या में थे पर कठिन निर्णय लिये गये और आज उनका लाभ हर किसी को नज़र आ रहा है। जो रेलगाड़ियां नई दिल्ली या पुरानी दिल्ली आया करती थीं, उनको निज़ामुद्दीन पर ही समाप्त कर देना भी यातायात संकुलन से बचने का ही उपाय है। इन सारे प्रयासों के बाद भी दिन के कुछ घंटों में दिल्ली में यातायात संकुलन की स्थिति दिखाई देती है पर सहारनपुर जैसा बुरा हाल वहां नहीं है।
जो प्रशासक दीर्घकालीन निर्णय नहीं ले पा रहे, वही प्रशासक तात्कालिक उपायों से भी मुंह चुराते दिखाई देते हैं। यातायात नियंत्रण का एक अनिवार्य अंग यह भी है कि व्यवस्था भंग करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाये ताकि व्यवस्था का महत्व जनता को समझ में आये व किसी को कोई परेशानी न हो । पर इस मामले में सहारनपुर में "अंधेर नगरी चौपट राजा" कहावत पूरी तरह से चरितार्थ होती दिखाई देती है। यातायात व्यवस्था नाम की भी कोई चीज़ होती है, यह बात सहारनपुर के वाहन चालक अब पूरी तरह से भुला चुके हैं। यदि सड़कों पर, चौराहों पर यातायात पुलिस होती भी है तो केवल गैरकानूनी सामान ढो रहे ट्रक और ट्रैक्टर ट्रॉलियों से अपनी उगाही करने के लिये । यातायात माह मनाने की भी परंपरा यहां चली आ रही है पर उसका अर्थ है बच्चों से निबंध लिखवाना, भाषण दिलवाना, उनको इनाम बांट देना और बस ! यदि बहुत हुआ तो वाहन चालकों का लाइसेंस, गाड़ी के पेपर आदि जांच लिये।
तेज गति से वाहन चलाना, वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करना, हर चौराहे पर, तिराहे पर जाम लगा देना, शराब पीकर वाहन चलाना, ओवरलोड वाहन चलाना, स्कूटर मोटर साइकिल पर तीन-चार सवारियों का बैठना, खंडहर बन चुकी गाड़ी को सड़कों पर दौड़ाना, जुगाड़ चलाना, लोहे के सरिये के पीछे लाल बत्ती या लाल कपड़ा नहीं बांधना, गाड़ियों में आगे हैडलाइट और पीछे रिफ्लेक्टर का न होना, गाड़ी में से कितना भी धुआं निकलना, हेल्मेट न पहनना, सीट बेल्ट न लगाना - सहारनपुर में अपराध नहीं माना जाता। यही नहीं, सहारनपुर में तो आधी सड़क घेर कर पुरानी मोटर साइकिलों का बाज़ार लगाना भी अपराध नहीं माना जाता। ऐसा क्यों है, इसका उत्तर तो हमारा पुलिस व नागरिक प्रशासन ही बेहतर दे सकता है। सहारनपुर की यातायात नियंत्रण व्यवस्था (यदि ऐसी कोई चीज़ यहां है तो पूर्णतः पंगु हुई पड़ी है और सहारनपुर के पुलिस उपमहानिरीक्षक जनता से पूछते हैं - "आखिर ऐसा क्यों होता है कि दिल्ली में प्रवेश करते ही यातायात के सब नियम याद आ जाते हैं पर यू. पी. में कोई नियम याद नहीं रहते?" अब इस प्रश्न का उत्तर तो कक्षा पांच के बच्चे को भी मालूम है फिर भला पुलिस के आला अधिकारी को क्यों नहीं मालूम होगा। पर, इस सादगी पर कौन न मर मिटे ऐ खुदा ! ये हमारे माननीय पुलिस उपमहानिरीक्षक महोदय का भोलापन है, सादगी है, अज्ञानता है या अपने अधीनस्थों की काहिली पर पर्दा डालने का निरर्थक प्रयास - यह तो कहना कठिन ही है। यदि इस प्रश्न का उत्तर उनको वास्तव में ही नहीं मालूम तो फिर बच्चों से जो दो-ढाई सौ निबंध लिखवाये थे, उनको ही पढ़ डालिये, आपको अपने सभी प्रश्नों का उत्तर मिल जायेगा।
सहारनपुर की यातायात प्रणाली को सुचारु करना हो तो इन उपायों पर तत्काल अमल किया जाना चाहिये -
१- सहारनपुर रेलवे स्टेशन के निकट से बस अड्डे को तुरंत शहर से बाहर अंतरित किया जाये ।
२- सभी ट्रांसपोर्टरों को सहारनपुर के ट्रांसपोर्ट नगर में स्थानांतिरित करने की व्यवस्था की जाये और इस विलंब के जो भी कारण हों, उनको दूर किया जाये। यदि ट्रांस्पोर्टर यूनियन इस बारे में जनहित के बजाय अपने सदस्यों के तात्कालिक हित को प्राथमिकता दे तो इस बारे में उनकी अनसुनी करते हुए सहारनपुर के व्यापक हित को ही महत्व दिया जाये।
३- पांवधोई नदी के दोनों तटों पर सड़क को तुरन्त पूरी तरह से अतिक्रमण मुक्त कराया जाये और यातायात के योग्य बनाया जाये। विशेषकर पुल जोगियान से लेकर ढमोला पुल तक दोनों ओर अतिक्रमण की भरमार है और सड़क भी टूटी फूटी हालत में है। यही स्थिति सब्ज़ी मंडी पुल से पुल खुमरान तक भी है। यदि वाहन-चालकों को वैकल्पिक मार्ग सही हालत में उपलब्ध कराया जायेगा तो वह नेहरू मार्किट, भगत सिंह मार्ग, लोहानी सराय आदि में जाम में फंसने के बजाय इन वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करना बेहतर समझेंगे।
४- जुबली पार्क में कार पार्किंग १० रुपये से बढ़ा कर अचानक २५ रुपये कर दी गई है। यदि कोई केवल एक घंटे के लिये वाहन खड़ा करता है तो उससे केवल १० रुपये पार्किंग शुल्क लिया जाये। १० बजे प्रातः से रात्रि आठ बजे तक किसी भी कार को नेहरू मार्किट में या भगत सिंह मार्ग पर प्रवेश की अनुमति न दी जाये। व्यस्त बाज़ारों के प्रवेश बिन्दु पर चौपहिया वाहनों के लिये ’नो एंट्री ज़ोन’ के बोर्ड लगाये जायें परन्तु वहां कोई भी यातायात नियंत्रक खड़ा न किया जाये। इसके बजाय बाज़ार में अंदर जांच कर ली जाये और जो भी चौपहिया वाहन ’नो एंट्री ज़ोन’ के बोर्ड को अनदेखा करते हुए बाज़ार के अंदर पाया जाये उसके चालक / मालिक को गिरफ्तार करके चौबीस घंटों के लिये हिरासत में रखा जाये और उसका वाहन जब्त कर लिया जाये। (या, इसी प्रकार की और कोई भी सख्त सज़ा दी जाये।
चार, पांच लोगों के साथ इस प्रकार की सख्त कार्यवाही होगी तो बाकी सब तुरन्त सही रास्ते पर आ जायेंगे।
इस प्रकार के प्रवेश बिन्दु घंटाघर, श्रीराम चौक, लोहानी सराय, मोरगंज, बड़तला यादगार आदि हैं जहां नो एंट्री बोर्ड लगाया जाना चाहिये।
५- शहर में ट्रैफिक जाम अक्सर वे वाहन चालक लगाते हैं जो पहले से खड़े वाहन के पीछे धैर्यपूर्वक खड़े होने के बजाय, उसकी बगल से आगे निकलने की चेष्टा करते हैं और इस प्रकार सामने से आने वाले वाहनों का रास्ता बन्द कर देते हैं। इन सभी वाहन चालकों को हल्के - फुल्के शारीरिक दण्ड, या भारी भरकम आर्थिक दण्ड द्वारा सुधारा जा सकता है। यदि लाइन तोड़ कर आगे निकलने की चेष्टा करने वाले हर स्कूटर मोटर साइकिल पर ५०० रुपये और कार पर १००० रुपये दंड वसूल किया जाये तो सहारनपुर में एक दिन में हीं एक करोड़ रुपये तक इकठ्ठे हो सकते हैं।
हमें पूर्ण विश्वास है कि यदि प्रशासनिक अधिकारी इस दिशा में सत्य हृदय से प्रयास करेंगे तो हम हर सड़क व चौराहे पर दिखाई देने वाले ट्रैफिक जाम से काफी हद तक मुक्ति पा सकेंगे।