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Saharanpur (24 Aug.) When whole of India is engaged in 2nd war of independence, how can students of Saharanpur remain unaffected by it? Today, hundreds of children of Jai Hind Public School, Sheikhpura Kadeem, under the guardianship of their teachers and the Principal carried out a mega-rally on the streets of Saharanpur. Shouting slogans – “Ek do teen chaar, band karo ye bhrashtachaar ! Anna Tum Sangharsh Karo, Hum tumhare saath hain; Anna nahin aandhi hai, desh ka doosra Gandhi hai; Bhrasthachaar, Nahin sweekaar; Anna ki santaano, apne ko pehchaano, Vande Maatram ! Jai Hind” they proved that India’s future is definitely bright with zero tolerance for corruption in public life.
Please click here for video clip of the rally
The rally, starting from school on Paper Mill Road galvanized the onlookers while marching through Paper Mill Road, Vishwakarma Chowk, Hospital Chowk, Clock Tower, Court Road, Collectorate, and Hakikat Nagar. From there, the children reached back to their school. It was organised by Baleshwar Tyagi with full support from the Principal Preeti Thakral, Sourabh Singh, Kavita, Kiran Pandey, Renu Garg, Akanksha, Vibha Burman, Komal Sood, Savita Dhanuka, Sonu Kumar. Khushboo Singh, Pratibha, Kajal, Smita, Lakshan, Garvit, Sourav, Rajkumar, Rajan Mohan, Sachin, Devyansh, Ravi, Sonu, Sumit, Neeti, Saksham and many more played an important role in making the event a highly successful one.
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सरकार का कहना है कि लोकपाल बिल पास कराने के लिये समय-सीमा तय करने के लिये कहना उसके साथ बहुत बड़ी ज्यादती है। सरकार का कहना है कि वह इस मामले को 42 वर्षों से लटकाते चले आ रहे हैं और अब अन्ना हैं कि 30 अगस्त तक बिल पास कराना चाहते हैं ! सरकारी काम इस स्पीड से हुआ करते हैं क्या?
सरकार का कहना बिल्कुल सही है। अगर सरकारी कर्मचारी, अधिकारी और मंत्री जनता के काम तुरत-फुरत करने लगें फिर तो हो ली कमाई ! अगर अधिकारी किसी काम को सालों साल तक न लटका कर रखें तो उनकी पूछ ही खत्म हो जायेगी ! दिनों का काम महीनों में और महीनों का काम सालों में करते हैं तब ही तो लोग नोटों के ब्रीफ केस लेकर आगे पीछे घूमते हैं कि “सर, हमारा काम थोड़ा जल्दी करा दीजिये ! ये ब्रीफकेस आपके बच्चों के मिठाई के वास्ते ! ” अगर आवेदन पत्र आते ही स्वीकृति के हस्ताक्षर करने पड़ें तो अफसर और बाबू में फर्क ही क्या रह जायेगा ? सरकारी काम-काज में देरी ही तो वह मूल मंत्र है जिससे पूरा एक भ्रष्ट तंत्र फल-फूल रहा है। न जाने कितने लाख दलालों के परिवार की रोजी रोटी इसी देरी को कम करवाने से चलती है। आप सीधे अफसर या मंत्री को घूस देने का प्रस्ताव नहीं कर सकते । उसके लिये आपको थ्रू प्रोपर चैनल जाना होता है और वह चैनल है दलाल !
आपको ड्राइविंग लाइसेंस चाहिये, राशन कार्ड चाहिये, पासपोर्ट बनवाना हो, अपना ट्रांसफर करवाना हो या रुकवाना हो तो अधिकारियों का काम होता है उसमें यथासंभव फच्चर अड़ाना, कानूनी बारीकियां दिखा कर, आपके प्रार्थनापत्र में बीस नुक्स निकाल कर आपको इधर से उधर, उधर से इधर भटकने के लिये विवश करना । फिर कोई दलाल आपके पास आता है तो आपके ज्ञान चक्षु खुलते हैं कि इतने पैसे देने से सारी कानूनी विवशतायें समाप्त हो जायेंगी और आपके प्रार्थनापत्र पर साब हस्ताक्षर कर देंगे। कई बार लोग अपने विधायक या सांसद के पास जाते हैं कि उनकी चिठ्ठी से काम बन जायेगा पर अफसरों का स्पष्ट मत है कि घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या ! कुछ काम बड़े स्तर के होते हैं जो प्रशासन के स्तर के न होकर शासन के स्तर के होते हैं। इनमें मंत्रियों की अनुकूल टिप्पणी या नीतिगत स्तर पर फैसले की आवश्यकता होती है। यहां आपकी सेवा आपके सांसद और विधायक करते हैं जो आपका काम कराने के लिये ठीक उसी प्रकार जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेते हैं जैसे दलाल लोग करते हैं।
अदालतों में यह दलाली की जिम्मेदारी वकीलों के कंधों पर है। जो जज के मुंहलगे वकील हैं, वह आपका मनपसंद फैसला निश्चित समय सीमा में करा सकते हैं । इसीलिये आज कल मुकद्दमें का फैसला सुरक्षित रखने का फैशन चल पड़ा है। फैसला “सुरक्षित” कर देने के बाद दलालों का काम शुरु होता है, जिस पक्ष का ब्रीफ केस ज्यादा भारी हो, उसका भाग्य संवर जाता है। हफ्ता या महीना इसी काम के लिये दे दिया जाता है।
लोकपाल बिल का भी जहां तक संबंध है, इसमें अन्ना पार्टी को और देश को समझाया जा रहा है कि इसमें बहुत सारी तकनीकियां हैं, विवशतायें हैं, गंभीर विचार-विमर्श की आवश्यकता है, सर्वदलीय बैठक होगी, स्टैंडिंग कमेटी इस पर विचार करेगी उसके बाद संसद में इस पर बहस होगी और वोटिंग होगी, बिल पास होगया तो राष्ट्रपति की मंजूरी के लिये जायेगा। उनके स्तर पर भी कई वर्ष लग सकते हैं। यह कोई सांसदों का वेतन तिगुना करने जैसा महत्वपूर्ण मामला थोड़ा ही है कि तीन मिनट में पास करना पड़े ! न कोई स्टैंडिंग कमेटी, न बहस, ना ही वोटिंग ! इधर विधेयक पर निगाह पड़ी और उधर तुरंत पास ! जो मामला बयालीस साल तक प्रतीक्षा कर सकता है, वह बयालीस साल और प्रतीक्षा नहीं कर सकता क्या?
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अन्ना के आंदोलन की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण कारण मुझे तो ये लगता है कि उन्होंने अपने हृदय में जल रही ज्वाला को जन-जन की ज्वाला में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की। दूसरे अर्थों में ये कहूं कि – “मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना” अनशन के दौरान रामलीला मैदान में गाया जाने वाला एक गीत मात्र नहीं है, यह एक वास्तविकता बन गया है। जिस विश्वास के संकट से विभिन्न राजनीतिक पार्टियां और बड़े – बड़े नेता जूझते नज़र आ रहे हैं, जनता का वह अगाध विश्वास अन्ना हज़ारे को सहज ही हासिल है। मजे की बात ये भी है कि टीम अन्ना के विरोधियों ने इस टीम के प्रमुख सदस्यों में शामिल पिता-पुत्र द्वय शांति भूषण एवं प्रशान्त भूषण की ईमानदारी पर बहुत बार सवाल उठाये और इस टीम की छवि खराब करने की कोशिश कई बार की परन्तु चूंकि अन्ना, किरन बेदी और अरविन्द केजरीवाल की छवि पर कोई भी दाग नहीं है, अतः जनता ने शांतिभूषण के विरुद्ध लगाये जा रहे आरोपों को भी नज़र अन्दाज़ कर दिया। वैसे भी आप अपने भ्रष्टाचार को यह कह कर सही साबित नहीं कर सकते कि “तुम कौन सा दूध के धुले हुए हो?” अगर शांति भूषण और प्रशान्त भूषण भी भ्रष्टाचार के दोषी हैं तो देश के कानून को उनसे निबटने के लिये किसने मना कर रखा है? आखिर घोटालों और काले धन के विरुद्ध सशक्त आवाज़ बन कर उभरे बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों के विरुद्ध भी तो सरकार ने फटाफट जांच एजेंसियों को लगा दिया है और ये जांच एजेंसियां अपना कार्य इतनी मुस्तैदी से करने में जुटी हुई हैं जो मुस्तैदी सत्तासीन नेताओं के विरुद्ध जांच के मामलों में कहीं नज़र नहीं आती।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध छेड़े गये अपने अभियान के दूसरे चरण में मिली सफलता से टीम अन्ना और पूरा देश उत्साहित है और जश्न में डूबा हुआ है। हमारा राजनैतिक नेतृत्व अभी भी सकते की स्थिति से बाहर नहीं निकल पाया है, वैसे भी हमारी सरकार अपना सत्ता में रहने का अपना नैतिक अधिकार गंवा चुकी है। कहा जा सकता है कि देश इस समय ऑटो मोड में चल रहा है। सफल आंदोलन को चलाने के बाद, देश को आगे भी सही दिशा और योग्य नेतृत्व देने की जिम्मेदारी फिलहाल अन्ना और उनकी टीम के ही कंधों पर दिखाई दे रही है। खास कर, उत्साह से फूले नहीं समा रहे युवाओं की अपार ऊर्जा को सही दिशा में उपयोग करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि इस ऊर्जा को अपनी अभिव्यक्ति के लिये सही मार्ग मिलता रहे तब तो वह सकारात्मक परिणाम देगी वरना उसका प्राकट्य नकारात्मक रूप में भी हो सकता है। मंच से टीम अन्ना की प्रमुख सदस्य किरन बेदी ने बार बार उन लोगों के प्रति जनता को सचेत भी किया है जो अपनी अनुशासन हीनता से इस आंदोलन को हानि पहुंचा सकते हैं।
राजनैतिक दलों से टीम अन्ना की दूरी उसे सर्वमान्य स्वरूप दे रही है पर यह स्थिति कब तक चल पायेगी, कहना कठिन है। सभी राजनैतिक दल अन्ना की लोकप्रियता की लहरों पर सवारी करने को उत्सुक नज़र आ रहे हैं । कांग्रेस, जो इस समय खलनायक की भूमिका में खड़ी नज़र आ रही है, जल्द से जल्द अपनी खोई हुई जमीन को पुनः तलाशना चाहेगी वहीं दूसरी ओर भाजपा भी जनता की निगाह में इस जीत की असली हीरो के रूप में प्रस्तुत करने को लालायित है। कुछ लोग तीसरे मोर्चे के गठन की भी आशा लगाये बैठे हैं। टीम अन्ना का और इस देश का हित इसी में है कि यह टीम जनता के साथ सीधे संवाद करने की अपनी शैली पर ही भरोसा किये रहे और इस संवाद को और गहराई तक लेकर जाये ताकि जनता का विश्वास और समर्थन उसे निरंतर मिलता रहे। ये सभी राजनीतिक पार्टियां और संसद में बैठे जन-प्रतिनिधि टीम अन्ना के प्रति जन-जन के विश्वास और समर्थन को और उससे उत्पन्न इस दबाव को अनुभव करते रहेंगे तो वह सब मांगें पूरी हो जायेंगी जो जनता का भाग्य संवार सकती हैं। ये जन-प्रतिनिधि कोई भी ऐसा कानून अपनी खुशी से तो बनायेंगे नहीं जिससे उनके अधिकारों और विशेषाधिकारों में कटौती होती हो, उन पर, उनके अनुचित व्यवहार पर अंकुश लगता हो । अपने शरीर पर कौन मरीज़ डाक्टर के हाथों खुशी- खुशी चाकू चलवाता है? मरीज़ को अक्सर बेहोश करके ही उसका आपरेशन करना पड़ता है। ये व्यापक जन समर्थन वह बेहोशी की दवा है जो अन्ना रूपी डाक्टर के पास है। इस व्यापक जन-समर्थन का द्बाव कम न हो, यही इस वक्त की सबसे महती आवश्यकता है।