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Summer Camps keep Saharanpurians busy and entertained!

Posted by Sushant Singhal on May 15, 2012 at 10:45 PM Comments comments (0)

Saharanpur - 16 May 2012.    Gone are the days when children considered their summer vacations a two-month long period to go to relatives with their mom or to go to some hill station with parents and family.  Now there are a large number of activities - both curricular and extra-curricular waiting for them.


Dance workshops are the most popular activites not only among youngsters but also their parents.  Participation in a dance workshop, esp. if organised by some well established dance school can throw open the gateway to the world of TV and films.  A large number of privately run dance schools have come up in Saharanpur which include prestigious names like BCPA (Bharat College of Performing Arts - a brain child of Internationally acclaimed Kathak exponent Acharyaa Pratishtha Sharma) and Vaishnavi Nrityalaya (being run by Boogie-Woogie fame Ranjana Neb Jain).   Besides these highly sought - after dance schools, there are some more who may not be as widely acknowledged but have very talented choreographers running them.   The choreographer couple  Nayak Khanna - Shivani Bhargava Khanna and Sohan Singh - Kinjal Dogra's The Dance Planet are carving a definite place for themselves in the dancing stage of Saharanpur. 


The way a win secured by the Indian team in a prestigious cricket tournament serves to enthuse children so much so that they are seen playing cricket in every open space and ground, likewise, a talented child who successfully qualifies for some reality show TV serial and starts appearing on TV, inspires other children of his / her town to follow suit.  There is a long list of children and youths of Saharanpur who successfully demolished iron gates of TV studios and set precedents for others.  Legendary Zohra Sehgal, Kanwaljeet, Dharna Pahwa,  Ajay Jhingran,  Ranjana Neb,  Ashok Verma, Aastha Sharma, Harry Kalra,  Phalguni Bhardwaj, Tejaswi and many more have faced a TV cameras and mesmerized their fellow Saharanpurians and rest of  India with their acting and dancing talent.   The latest dancing sensation - Shreya Singhal, age 9,  is at present in Mumbai - perspiring to make an honourable place for herself in Dance India Dance's L'tle Masters.  


In earlier days too, children had dancing talents but their parents used to be least interested in promoting their children.  But, today's parents do everything within their means to ensure that their children get full opportunity to test their talents.  Not only they spend money on their training but are willing to make unimaginable sacrifices for their children.  Suneet Gupta, a businessman for example, is in Mumbai with his daughter Shreya Singhal since 11th April where Shreya is participating in Dance India Dance of Zee TV.   Sundeep Sharma and Seema Sharma (parents of Phalguni Bhardwaj),  Kamal Sharma and Asha Sharma (parents of Aastha Sharma)  have also stayed at Mumbai for several months pinning their hopes on their respective child.  


Padmashree Bharat Bhushan Ji turns 60 !

Posted by Sushant Singhal on May 7, 2012 at 3:35 AM Comments comments (0)

   

             कल स्थानीय जनमंच सभागार में श्रद्धेय गुरुजी योगीराज पद्मश्री भारत भूषण जी की षष्टिपूर्ति के उल्लासमय अवसर पर उनकी योग्य सुपुत्री एवं शिष्या आचार्या प्रतिष्ठा ने अपने शिष्यों व शिष्याओं के साथ मिल कर “उल्लास पर्व” का भव्य आयोजन किया।  बाल व किशोर आयु वर्ग की शिष्याओं और शिष्यों को दो वर्ष के छोटे से अंतराल में कत्थक जैसे कठिन नृत्य में इतनी निपुणता प्रदान कर देना कि वह अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अपनी योग्य गुरु आचार्या प्रतिष्ठा के साथ मंच पर प्रस्तुति दे सकें,  स्वयं में एक चमत्कार जैसा ही है !   नृत्य नाटिका के माध्यम से पद्मश्री भारत भूषण जी के जन्म से लेकर आज तक की प्रमुख घटनाओं को सुर और ताल के साथ इतनी कलात्मकता के साथ प्रस्तुत किया गया कि मेरे जैसे लोग जो कत्थक का ककहरा भी नहीं जानते, वह भी अपनी सीट के चिपके हुए एकटक मंच पर ध्यान केन्द्रित किये रहे !  भारत कालेज ऑफ परफार्मिंग आर्ट्स Bharat College of Performing Arts (BCPA) की प्राचार्या - आचार्या प्रतिष्ठा और उनके शिष्य व शिष्याओं को हार्दिक अभिनन्दन, साधुवाद एवं उज्ज्वल भविष्य हेतु शुभ कामनायें! 

 


      रहा सवाल श्रद्धेय गुरुजी पद्मश्री भारत भूषणजी का !   उनकी योग्यता, ज्ञान व योग के प्रति समर्पण के कारण किस – किस देश में उनके कितने हज़ार या लाख शिष्य हैं, यह हिसाब – किताब तो वह स्वयं भी नहीं रख पाते होंगे। वह एक महान और विराट्‍ व्यक्तित्व हैं, यहतो स्वयंसिद्ध है पर मेरी दृष्टि में उनकी महानता सबसे अधिक इस बात में है कि वह अपनी महानता के बावजूद नितान्त सहज और सरल हैं। बात-बात पर उनका निश्छल, बालसुलभ हास्य (जो अक्सर अट्टहास बन कर उनके आस-पास उपस्थित लोगों को आनन्द से भर देता है।;) उनके हृदय की उज्ज्वलता का परिचायक है।  सहारनपुर में आने के बाद मैं उनके बारे में समाचारपत्रों में पढ़ता रहता था, विभिन्न कार्यक्रमों में सभापति / मुख्य वक्ता के रूप में उनको विराजमान देखा करता था। एक बार अद्‍भुत दृश्य देखने को मिला । एक कार्यक्रम में वह मुख्य अतिथि थे ।  कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद वह मंच से उतरे तो श्रोताओं में उपस्थित एक व्यक्ति के चरणों में गिर गये और साक्षात्‌ दंडवत्‌ प्रणाम किया।  पता चला कि वह श्रोता विद्यालय काल में उनके गुरु थे।  ऐसे श्रेष्ठ व्यक्तित्व से मैं भी व्यक्तिगत परिचय प्राप्त करूं यह लालसा मन में बनी रही पर संकोच के कारण अनेक वर्ष यूं ही बिता दिये।  एक बार उनको दीपावली पर शुभ कामना संदेश ई-मेल किया ।  उनसे उत्तर मिले, यह इच्छा तो थी, पर आशा नहीं थी !  मेरे आश्चर्य और प्रसन्नता का ठिकाना न था, जब कुछ ही घंटे बाद उनका फोन आया और बोले  "मैं भारत बोल रहा हूं !  आपकी ईमेल मैने कम से कम सौ लोगों को आगे प्रेषित की है ताकि ये शुभ विचार अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सकें!"   Wow !    उन्होंने घर पर आने हेतु निमंत्रण दिया तो लगा कि मुंह मांगी मुराद मिल गई !   पहला अंतरंग परिचय उनसे उनकी ही डायनिंग टेबिल पर हुआ!  दो घंटे की प्रथम मुलाकात के दौरान उन्होंने न तो एक बार भी घड़ी की ओर देखा और न ही मुझे ऐसा लगा कि अब नमस्कार करके विदा ले लेनी चाहिये!   अंततः जब चलने के लिये अनुमति मांगी तो बोले, “यदि पन्द्रह मिनट का समय है तो आइये, चलते हैं!” पूरा परिवार कार में बैठा और गाड़ी जाकर रुकी घंटाघर के निकट एक आइसक्रीम पार्लर पर !  यह एक प्रगाढ़, अंतरंग मैत्री का शुभारंभ था !  

       एक बार कहीं पढ़ा था कि जैसे – जैसे आप किसी’महान’ व्यक्ति के, किसी सेलिब्रिटी के निकट परिचय में आते हैं तो आपके मन में उसके प्रति मौजूद आदर भाव क्रमशः कम होता जाता है क्योंकि आप न केवल उस व्यक्ति की महानता से, बल्कि उसकी कमियों से भी परिचित होते चले जाते हैं।  अक्सर महान कहलाने वाले, सेलिब्रिटी माने जाने वाले व्यक्तियों के ’पब्लिक फेस’ और ’प्राइवेट फेस’ में धरती-आकाश का अन्तर होता है।   परन्तु पद्म श्री भारत भूषण जी और आचार्या प्रतिष्ठा – दोनों के ही मामले में यह थ्योरी फेल हो जाती है।  इन दोनों ही व्यक्तित्वों से मेरी जितनी प्रगाढ़ मैत्री होती जाती है, उतना ही आदर भी बढ़ता हुआ अनुभव करता हूं!  शायद ऐसा इसलिये हो पा रहा है कि इन्होंने महानता का आवरण ओढ़ा हुआ नहीं है।  इनका वैशिष्ट्य तो सारे जगत को मालूम ही है जो इनको उच्च धरातल पर ले जाकर बैठाता है।   यह इनका ’पब्लिक फेस’ है जो बहुत चित्ताकर्षक है और लोगों को अपनी ओर खींचता है।  परन्तु इनका  ’प्राइवेट फेस’  यानि आंतरिक व्यक्तित्व भी  इतना ही अधिक, या शायद और भी अधिक,   सरल, निश्छल और  सहज है जो मेरी दृष्टि में वास्तविक रूप में महान होने की सबसे पहली आवश्यक अर्हता है!  इनके साथ बैठ कर सोचना नहीं पड़ता कि क्या बात की जाये!  बातों में से बातें सहज रूप मेंस्वयंमेव ही निकलती चली जाती हैं, कभी किसी के प्रति दुर्भावनापूर्ण विचार सुनने को नहीं मिलते, बातचीत में कभी नकारात्मकता का समावेश नहीं होता !  किसी को महज ’इंप्रेस’ करने के लिये भारी-भरकम बातें करने की आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती !  पूर्णतःसहज, सरल और उन्मुक्त, जैसे अपने घर के ही सदस्यों के बीच में बैठे हों !   श्रद्धेय गुरुजी कभी इस यह भी प्रतीक्षा नहीं करते कि दूसरा उनको नमस्कार करे तो वह उत्तर दें !   खुद अपनी ओर से आगे बढ़ कर प्रणाम करने में उनको कभी कठिनाई नहीं होती !  

       परम पिता परमात्मा से विनती है कि ऐसे श्रेष्ठ व्यक्तित्वों की संख्या में दिनानुदिन श्रीवृद्धि हो और हम सब को उनका निरंतर सान्निध्य और स्नेह अनन्त काल तक मिलता रहे !   

 

??????? ??? ??? ???? ?? ?? ! Paondhoi needs cleaning again!

Posted by Sushant Singhal on March 26, 2012 at 9:05 AM Comments comments (0)

                पिछले दो वर्षों में सहारनपुर नगर पूरे उत्तरप्रदेश में अपनी पांवधोई नदी के कारण चर्चा में रहा है।  ‘सहारनपुर में जनता व प्रशासन मिल कर अपनी पांवधोईनदी को साफ करने का अभियान छेड़े हुए हैं ‘   यह समाचार और इस अभियान से जुड़ी खबरें लगभग हर रोज़ समाचार पत्रों की सुर्खियां बनते रहे हैं ।  सहारनपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक कुमार ने व्यक्तिगत रुचि लेते हुए इस अभियान को नेतृत्व दिया और उनके पीछे-पीछे पूरा प्रशासनिक अमला पांवधोई की सफाई के लिये दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ता दिखाई दिया तो जनता और मीडिया में भी उत्साह का ज्वार आ गया।  जिलाधिकारीने इस अभियान को संचालित करने के लिये “पांवधोई बचाओ समिति” का गठन किया जिसमें ११प्रशासनिक अधिकारी और ११ प्रतिनिधि जनता में से नामित किये गये।  समिति के सभी सदस्य पूरे उत्साह से हर रोज़ सुबहपांवधोई के तटों पर सफाई अभियान को गति प्रदान करते हुए दिखाई देने लगे। 

इसअभियान को जनता ने उस दिन पूर्ण सफलता का प्रमाण पत्र प्रदान कर दिया जब एक अविस्मरणीयशाम को नदी तट पर आ जुटे हज़ारों स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों ने अपनी विस्मित आंखोंसे केवट लीला का पांवधोई नदी के अंदर वह मंचन देखा जो पैंतीस साल पहले नदी में व्याप्तभयानक गंदगी के कारण बन्द कर दिया गया था। केवल चार माह में नदी का इतना साफ हो जाना कि उसमें राम – सीता और लक्ष्मण नावमें सवारी कर के भूतेश्वर मंदिर से रामेश्वर मंदिर तक जा सकें – एक चमत्कार जैसा हीथा और ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि इस आंदोलन को नेतृत्व प्रदान कर रहे जिलाधिकारीएक प्रशासनिक अधिकारी के स्थान पर लोक नायक के रूप में देखे जाने लगे ।  “पांवधोई बचाओ समिति” की कर्मठता की भी भूरि – भूरिप्रशंसा हुई और उत्तर प्रदेश सरकार ने चौबीस जनपदों के जिलाधिकारियों को निर्देश देदिये कि पांवधोई नदी के सफाई अभियान को आदर्श मानते हुए वह भी अपने अपने जनपदों मेंस्थित नदियों के पुनरुद्धार का कार्यक्रम चलायें !   वाह ! सहारनपुर पूरे उत्तर प्रदेश के लिये एक आदर्श बन गया !  

      परन्तु जो लोग यह सोच रहे थे कि “एक बार साफकर दिये जाने के बाद पांवधोई गंगा अब भविष्य में पुनः गंदी नहीं होगी”  यह देख कर बड़े निराश और दुःखी हुए कि अगले वर्षरामलीला आते – आते नदी पुनः भयानक रूप से गंदी हो चुकी थी।  पिछले सफाई अभियान के नायक जिलाधिकारी आलोक कुमारसहारनपुर से जा चुके थे पर जन – आकांक्षाओं के दबाव में प्रशासन ने नदी के उस भाग में,जहां केवट लीला मंचित की जानी थी, एक सप्ताह के लिये हड़बड़ी में विशेष सफाई अभियान चलायाऔर नदी को इस लायक कर लिया कि रामलीला समिति के पदाधिकारी वहां केवल लीला हेतु हामीभर दें !  जैसे – तैसे मंचन संपन्न हो गया औरप्रशासन व “पांवधोई बचाओ समिति” ने भी राहत की सांस ली।

      परन्तु पांवधोई गंगा के साफ सुथरे स्वरूप कीकुछ लोगों को बार बार याद आती रही और नदी के पुनः गंदे हो जाने का क्षोभ समाचार पत्रोंमें छलकने लगा ।  प्रशासन और पांवधोई बचाव समितिके सदस्यों को ललकारा जाने लगा कि कहां सो गये पांवधोई के पालनहारों !   बस, जन आकांक्षाओं का दबाव पुनः बढ़ने लगा तो आनन– फानन में मीटिंग बुला कर संकल्प लिया गया कि सफाई अभियान पुनः चलाया जायेगा।  पर इस बार न तो प्रशासन में उत्साह है और न ही जनतामें!   यक्ष प्रश्न है कि ऐसा क्यों हो रहाहै?  आखिर पांवधोई गंगा बार – बार इतनी गंदीक्यों हो जाती है कि कुछ महीनों में ही इसमें बीसियों जे.सी.बी. मशीनें और ट्रक उतारनेपड़ते हैं और हज़ारों टन मलबा बाहर निकाल कर फेंकना पड़ता है? 

      दो वर्ष पहले १२ मई २०१० से आरंभ हुए सफाई अभियानके बाद चार मास के अल्प काल में ही पांवधोई नदी का निखरा – निखरा उज्ज्वल स्वरूप देखकरसहारनपुर वासियों के उत्साह का कोई ओर-छोर नहीं था । सफाई अभियान से जुड़ा हर व्यक्तिआत्ममुग्ध था और अपनी पीठ थपथपा रहा था।  जनताभी प्रशासन और पांवधोई बचाओ समिति की जय-जयकार कर रही थी। पर पांवधोई नदी को  साफ – सुथरा उज्ज्वल स्वरूप प्रदान करने में जहांइस बात का योगदान था कि उन चार महीनों में नदी में से लगभग आठ हज़ार ट्रक मलबा बाहरफेंक दिया गया था वहीं इस बात का भी महत्वपूर्ण योगदान था कि जुलाई – अगस्त – सितंबरमें मानसूनी वर्षा से नदी में साफ सुथरे पानी की भरमार हो गई और तीव्र गति से बह रहेवर्षा जल ने नदी की तलहटी में जमी हुई बची-खुची गंदगी को आगे धकेल दिया।  वर्षा का साफ सुथरा पानी नदी में इतना अधिक हो गयाकि नदी को निरंतर सड़ा रहे सरकारी नाले और सीवर भी वर्षा के दिनों में निष्प्रभावी सेहो गये।  पांवधोई बचाओ समिति की बैठकों के दौरानइन नालों का ज़िक्र करने से और नगर की जल-मल निकासी व्यवस्था को सुधारने की आवश्यकतापर बल देने से पांवधोई सफाई अभियान के संचालकगण उन दिनों नाराज़ हो जाते थे और उनकोलगता था कि जब हर कोई जय-जयकार कर रहा है तो ये क्यों इन कठिन मसलों को उठा कर मूडखराब कर रहे हैं?  पर क्या शुतुरमुर्ग की तरहसे रेत में गर्दन दबा लेने से कठिन समस्याओं से पार पाया जा सकता है?  समस्याओं की ओर बार – बार इंगित करने वाले व्यक्तिकी आप उपेक्षा तो कर सकते हैं पर उन समस्याओं का निराकरण तो फिर भी आपको करना ही पड़ेगा! 

      पांवधोई ही नहीं, देश की अनेकानेक नदियों कीदुर्दशा का एक प्रमुख कारण यह है कि शहरी विकास के नाम पर नदियों को शहर भर की गंदगीको ढोने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। हमारे प्रशासकों को ठोस और तरल कूड़े के निस्तारणका यह सबसे सरल और सुविधाजनक उपाय नज़र आता है कि सारे कूड़े और रसायनों को नदी तक पहुंचादिया जाये ताकि नदी अपने प्रवाह के साथ इस सारी गंदगी को आगे ले जाये !  ऐसे में, न सिर्फ ठोस कूड़ा करकट, बल्कि घरों, दुकानों, फैक्टरियों, मिलों से निःसृत होरहा गंदा पानी व रसायन नदियों में पहुंचा दिये जाते हैं और यह मान लिया जाता है किगंदगी की समस्या से मुक्ति मिल गई है।  वैज्ञानिकरीति से ठोस कूड़े और तरल रसायनों के निस्तारण में मेहनत करनी पड़ती है, दिमाग और पैसाखर्च करना पड़ता है, ऐसे में सीधा, सस्ता और सुगम उपाय हर किसी को यह दिखाई देता हैकि बह रहे पानी में सारी गंदगी डाल दो।  आंखओझल, पहाड़ ओझल ! 

      सहारनपुर की पांवधोई नदी भी शहर के बीचों बीचसे निकलने के अपने ’अपराध’ का अनेक दशकों से यही दंड पाती रही है।  सैंकड़ों सरकारी और गैर सरकारी नाले - नालियां औरसीवर इस नदी में उतारे जा रहे हैं। नगर पालिका ने नदी के दोनों तटों पर खुले आकाश केतले बीसियों कूड़ा संग्रह केन्द्र बना डाले हैं। दोनों तटों पर स्थान-स्थान पर शौचालय और मूत्रालय बनाये गये, गाय-भैंसों केतबेले बनाये गये और यह नितान्त स्वाभाविक माना गया कि यह सारी गंदगी जस की तस नदी मेंपहुंचा दी जाये।  नगर में प्रवेश के साथ हीजब पांवधोई नदी भूतेश्वर मंदिर के आगे से निकली तो मूर्तियां और पूजा का सामान इसमेंप्रवाहित कर दिया गया,  अनाज मंडी से निकलीतो छान कर निकाला गया कूड़ा नदी के हवाले कर दिया गया। थोड़ा सा आगे चल कर नदी सब्ज़ीमंडी में पहुंची तो बचे खुचे, सड़े गले फल, सब्ज़ियों के छिलके, पैकिंग मैटीरियल, पॉलीथिनकी थैलियां नदी को भेंट कर दी गईं !  वर्षोंऔर दशकों तक यही सब देखते-देखते हालत यह हो गई कि लोग पांवधोई को नदी नहीं बल्कि गंदानाला ही मानने लगे!  वर्ष २००७ में जब पांवधोईनदी के वास्तविक पावन स्वरूप को वापिस लौटाने हेतु इस लेखक द्वारा कुछ मित्रों को साथलेकर अभियान आरंभ किया गया तो सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि जनता को पांवधोई नदी का वास्तविकपरिचय कैसे पहुंचाया जाये!  नगर पालिका और जिलाप्रशासन को भी ऐसी कोई जरूरत अनुभव नहीं होती थी कि इस “गंदे नाले” का उद्धार करकेइसका पावन स्वरूप इसे लौटाया जाये।  आई. आई.ए. जैसी बड़ी संस्थाओं ने अपने स्तर पर सफाई के प्रयास किये, लाखों रुपये खर्च कियेपर कुछ ही दिनों में नदी को पुनः जैसे का तैसा होता देख कर वह भी हिम्मत हार बैठे!      

वर्ष २०१० में जिलाधिकारी आलोक कुमार के नेतृत्वमें चलाये गये पांवधोई बचाओ अभियान के दौरान २००७ में निर्मित कार्य-योजना को स्वीकारकिया गया और इस अभियान का सबसे सफल पक्ष यह है कि आज किसी को यह बताने की आवश्यकतानहीं रह गई है कि पांवधोई गंदा नाला नहीं हैबल्कि पावन गंगा की एक धारा है। उस दौरान समाचार पत्रों के माध्यम से जो जन-जागरणअभियान चलाया गया, उससे जनता में इस नदी के उद्धार की भावना और सफाई अभियान के साथजुड़ने हेतु उत्साह जगा है।  पर नदी को बार– बार गंदगी की ओर लौटा रहे मूलभूत कारकों को लेकर प्रशासन का रवैया आज भी चलताऊ है। इन उपायों की क्षण-भंगुरता को देखते हुए, वहीपुराना उत्साह दोबारा अनुभव करना भी कठिन हो रहा है।  प्रशासन को पांवधोई का सफाई अभियान अब गले पड़ा ढोलअनुभव होने लगा है जिसे चाहे न चाहे, उसे बजाना पड़ेगा।  मन ही मन  प्रशासन के वर्तमान अधिकारी पूर्व जिलाधिकारी आलोककुमार को कोसते रहते होंगे कि खुद तो इलाहाबाद चले गये, ये मुसीबत हमारे गले में बांधगये।  अब प्रशासन कुछ हरकत करता दिखाई देताभी है तो वह महज जन – आकांक्षाओं के दबाव में। कुछ करने की सूझती है तो बस यही कि कुछ सफाई कर्मचारी नदी में उतार दिये जायेंजो कूड़ा बीनते रहें।  ज्यादा दबाव पड़ता है तोजे.सी.बी. मशीन और ट्रक भी नदी में उतार दिये जाते हैं।  परन्तु मूल समस्या तो जस की तस है।

जैसा कि पहले इंगित किया गया है, नदी में अनेकानेकसरकारी नाले उतारे जा रहे हैं जो पूरे शहर की गंदगी नदी को सौंपते हैं।  इन नालों के अतिरिक्त नगर निगम ने नदी के दोनोंतटों पर शौचालय, मूत्रालय और कूड़ा संग्रह केन्द्र बना रखे हैं ।  कूड़ा संग्रह केन्द्र का अर्थ है कि खुले आकाश केनीचे व्यस्त मार्गों पर, आधी से अधिक सड़क घेर कर पूरे शहर का कूड़ा, इंसानों और जानवरोंका मल आदि फैला दिया जाता है जिसे नगर पालिका के ट्रक कुछ घंटों या कुछ दिनों के बादउठाते हैं। आवारा गाय, कुत्ते और सुअर दिन भर इन कूड़ा घरों पर अपने लिये भोजन तलाशतेहुए देखे जा सकते हैं। नदी के तट पर बनाये गये इन कूड़ा संग्रह केन्द्रों में से कुछअपशिष्ट नदी में पहुंच जाता है।  नगर निगम नेसहारनपुर नगर के बीचों बीच से बहने वाली पांवधोई नदी के दोनों तटों को कूड़ा संग्रहकेन्द्र के रूप में उपयोग करने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त स्थान माना – इससे नगर निगमके प्रशासकों के चिंतन की दिशा और दशा स्पष्ट हो जाती है।  

पांवधोई नदी के तट को धोबीघाट के रूप में इस्तेमालकरने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त मानना नगर निगम के अधिकारियों की विकृत सोच का एक औरशर्मनाक नमूना है।  धोबीघाट पर तत्कालीन मंत्रियोंके नाम के पत्थर लगे हुए आज भी देखे जा सकते हैं। नदी के तट पर धोबीघाट का फीता काटतेहुए इन मंत्रियों को बहुत गर्व अनुभव हुआ होगा। परन्तु जब तक नगर निगम अपने नालों को पांवधोई से बाहर नहीं करेगी,  अपने कूड़ा संग्रह केन्द्रों को नदी तट से स्थानांतरितनहीं करेगी,  धोबीघाट को किसी अन्य स्थान परनहीं ले जाया जायेगा, नदी तट पर बनाये गये शौचालयों और मूत्रालयों को नहीं हटाया जायेगा– तब तक पांवधोई की सफाई की कल्पना आत्म प्रवंचना ही है इससे अधिक कुछ भी नहीं!   किसी शहरकी नदी कितनी साफ है या गंदी है यह उस शहर की जल-मल निकासी व्यवस्था की सफलता या असफलताका सबसे अधिक विश्वसनीय पैमाना है। खेद के साथ कहना पड़ता है कि सहारनपुर के लिये जल-मलकी निकासी व्यवस्था का निर्णय करने वाले नीति – निर्धारकों और प्रशासकों ने अपनी बुद्धिमत्ताऔर दूरदृष्टि का परिचय नहीं दिया है।  जब तकप्रशासन दशकों से चली आ रही अपनी विकृत जल-मल निकासी व्यवस्था में आमूल – चूल परिवर्तननहीं करेगा, तब तक नदी गंदी ही रहेगी!   

             

 

Saharanpurians donated blood today

Posted by Sushant Singhal on February 12, 2012 at 9:05 AM Comments comments (1)

Saharanpur ( 12 Feb. 2012 )   Saharanpurians formed a queue for a different reason today.  They were standing in the queue to give their blood in response to a call from The Saharanpur Dot Com and Sri Ram Krishna Sewa Sansthan (Regd.) here at IMA Bhawan, Saharanpur.  Total 61 units of blood were handed over to the team of doctors coming from Himalayan Institute Hospital Trust Jollygrant, Dehradun while 8 donors were found to be having poor blood and were therefore suggested to improve their RBCs and wait till next occasion.


Padmashree Bharat Bhushan, who together with Pt. Suresh Chaitanya,  Dr. S.K. Upadhyay, Pt. Jai Prakash Yagyik, Shri Satya Prakash Sharma and Sushant Singhal paid floral tributes to the holy memory of St. Pathik Ji Maharaj kudoed the maiden effort by thesaharanpur dot com and Sri Ram Krishna Sewa Sansthan. 


Reaching as early as 9.30 a.m.  for donating their blood were Shri Hariom Ganpati Sahastrabudhhe, Principal, Saraswati Vidya Mandir Inter College, Saharanpur, Miss Ragini Garg, Vipul Kapil and Anuj Jain. The people of Saharanpur did not allow the team of HIHT to take rest thereafter till 2 p.m.  


The credit for success of this evdeavour must go to Bhagwat Bhushan Pt. Jai Prakash Ji 'Yagyik' ,  Controller of Sri Ram Krishna Sewa Sansthan, who worked tirelessly for several days - meeting and motivating people to come forward for blood donation.  Not only this, the team of  Sri Ram Krishna Sewa Sansthan made necessary arrangements for the program under the skippership of Dr. S.K. Upadhyay, Chairman of the Saharanpur Chapter of Sewa Sansthan. 




Press Conference News

Posted by Sushant Singhal on February 7, 2012 at 11:00 AM Comments comments (0)

Amar Ujala - 6th Feb.




Hindustan Daily - 6th Feb. 2012



Janwani - 6th Feb. 2012

Blood Donation Camp on 12 Feb.

Posted by Sushant Singhal on February 3, 2012 at 1:00 AM Comments comments (0)


The Saharanpur Dot Com and Sri Ram Krishna Sewa Sansthan are jointly organising a mega BLOOD DONATION CAMP on coming 12th Feb. 2012 (Sunday).   A team of doctors would be coming from The Himalayan Institute and Hospital Trust, Joligrant, Dehradun  for this purpose.  The camp would be organised at following venue and time :


IMA Bhawan, Opp. Janakpuri Thana,  Hakikat Nagar Saharanpur


10 a.m. to 1 p.m.  - Sunday, 12 Feb. 2012


Among the dignitaries who would be present at the camp are Padmashree Bharat Bhushan Ji,  Sri Aditya Prakash Verma, S.P. (Rural) Saharanpur.   Sri Suveer Kumar Gupta, CEO, Shivalik Bank has offered to be a blood donor on the occasion.  

If you are a healthy person (not taking any medicine these days)  and have not donated blood during last 3 months, you are welcome to donate your blood.  As you would be knowing,  when we donate blood, we are not only giving life to someone who may be dying but we are improving the quality of our blood also.  Doctors say that one unit of blood donated by us is replenished within 15 days with fresh blood.  If you have a Blood Donor Certificate with you,  you are entitled to get same amount of blood in case any of your friends / family members are in need of the same.  


Please send us your confirmation to become a blood donor in the above camp,  by email or phone.    In case you cannot donate your blood for health or some other reasons, still, you are cordially invited to participate in the camp.  As a respectable member of The Saharanpur Dot Com,  you can shoulder various other responsibilities in the camp.

 


आपको जान कर हर्ष होगा कि द सहारनपुर डॉट कॉम और श्री रामकृष्ण सेवा संस्थान (रजि.) ने मिल कर आगामी 12 फरवरी 2012 को एक रक्तदान शिविर का आयोजन करने का निश्चय किया है जिसमें डॉक्टर्स की एक टीम हिमालयन हॉस्पिटल, जॉलीग्रांट, देहरादून से आ रही है।   कार्यक्रम इस प्रकार है - 

कैंप स्थल - IMA Bhawan,  Opp. Thana, Hakikat Nagar,  सहारनपुर 

समय व दिनांक - 12 फरवरी, 2012 - 10.00 a.m. ---  1.00 p.m.

यदि आप स्वस्थ हैं और आपने पिछले तीन मास में रक्तदान नहीं किया है, तो आप रक्तदान शिविर में रक्तदान के लिये सादर आमंत्रित हैं।   यदि आप रक्तदान नहीं कर सकते तो भी आप इस शिविर के आयोजन में अपना सहयोग कर सकते हैं ।    चिकित्सकों के अनुसार,  रक्तदान का दोहरा लाभ होता है - एक तो हम किसी की जान बचाने में सहयोग करते हैं और दूसरे,  हमारे अपने रक्त की भी शुद्धि हो जाती है।   जितना रक्त हम देते हैं, उतना रक्त बनने में केवल पंद्रह दिन लगते हैं ।    


यदि हमारे पास रक्तदान का प्रमाण पत्र है तो उसे दिखा कर हम अपने किसी मित्र / परिजन को आवश्यकता पड़ने पर रक्त भी दिलवा सकते हैं ।    हमारा मिनी स्वास्थ्य चेक अप भी योग्य चिकित्सकों द्वारा मुफ्त में ही हो जाता है।    


आशा है, आप रक्त दानदाता के रूप में इस शिविर में उत्साह सहित भाग लेंगे ।  कृपया अपनी स्वीकृति से हमें अवगत करायें ।  


यदि आप किसी भी वज़ह से रक्त दान नहीं कर पा रहे हैं तो भी हमें इस शिविर में आपकी आवश्यकता होगी ।  द सहारनपुर डॉट कॉम के सम्मानित सदस्य के रूप में आपका इस शिविर में हमारी जिम्मेदारियों में सहयोग करने के लिये हार्दिक स्वागत है।   

Happy New Year

Posted by Sushant Singhal on December 31, 2011 at 1:15 AM Comments comments (0)



“Another fresh new year is here .


. . . . . .


Another year to live!


To banish worry, doubt, and fear,


To love and laugh and give!


This bright new year is given me


To live each day with zest . . .


To daily grow and try to be


My highest and my best!


I have the opportunity


Once more to right some wrongs,


To pray for peace, to plant a tree,


And sing more joyful songs!”

 


Sonia Gandhi honours Saharanpur's Surgeon

Posted by Sushant Singhal on December 28, 2011 at 6:50 AM Comments comments (0)

Saharanpur (28th Dec.) Dr. Ashish Saini, M.S., a product of Asha Modern School Saharanpur, KGMC Lucknow and AIIMS, New Delhi  was honoured in a gracious programme in AIIMS's convocation function on becoming an expert in robotic surgery.  Dr. Ashish Saini was not only congratulated by his proud parents - Mrs. and Dr. Satya Prakash Saini of Anaj Mandi Saharanpur but also by  UPA's Chairperson Ms. Sonia Gandhi who honoured Dr. Ashish with the medal.  Dr. Ashish dedicated this great achievement to his parents and to the city of Saharanpur.

 

 

Robotic surgery or computer-assisted surgery is the latest surgical technique enabling a surgeon to carry out minimal invasive surgery by controlling various surgical instruments through computer-directed robot.  For this a tele-manipulator is used which allows the surgeon to perform normal movements during surgery while actual surgery is carried out by the robotic arm under guidance of the surgeon.  This helps the patient in having minimum possible incisions and high-precision instrumental control.

 



Dr. Ashish Saini, always a topper in school and also at King George Medical College, Lucknow during his MBBS and MS,  is one of the three surgeons from India and the only one from AIIMS, New Delhi who were hand-picked for the 30 days' rigorous training schedule in Las Vegas in US.  Ms. Sonia Gandhi, while felicitating the young doctor of Saharanpur for this extra-ordinary achievement, hoped that he would be better and even more comforting healer to his patients.  The Health Minister,  also present on the stage, gave away certificates to the honoured doctors.

 


Dr. Ashish Saini, a pool officer at AIIMS - the country's premier health-care institution has assured the people of Saharanpur that they would receive personalised attention if, God forbid, they need some medical attention.  

 


On behalf of Saharanpur, thesaharanpur.com extends heartiest congratulations to Dr. Ashish Saini and his veteran doctor father Rtn. Dr. Satya Prakash Saini on this great occasion. May the father-son duo continue to serve the people with same zeal and dedication which is so typical of them . 

 


A mail from Satish Mittal, Delhi

Posted by Sushant Singhal on December 14, 2011 at 4:05 AM Comments comments (2)

 

We have received the following letter in our mail.  We are reproducing the letter here for the benefit of our readers.  Mr. Satish Mittal also reiterated our suggestion to send emails and letters to the editor on daily basis to press the demand.

Editor

श्री सतीश मित्तल, दिल्ली से प्राप्त पत्र बहुत महत्वपूर्ण है जिसे हम अपने पाठकों के लाभार्थ यहां प्रस्तुत कर रहे हैं ।  श्री मित्तल ने भी इस सुझाव को दोहराया है कि हम सब को नित्य प्रति सैंकड़ों की संख्या में ई-मेल और संपादक को पत्र भेज - भेज कर रेल मंत्रालय पर दबाव बनाना चाहिये ताकि हमारी यह मांग शीघ्र ही पूरी की जाये । 


मेरठ , मुज़फ्फरनगर , सहारनपुर महत्तव पूर्ण शहर हें / मुज़फ्फरनगर तो दिल्ली से केवल लगभग १२० किलोमीटर की दुरी पर है तथा NCR ZONE के एकदम करीब है / मेरठ - मुज़फ्फरनगर- सहारनपुर रेल लाइन पर कुछ अन्य शहर भी है जहाँ पर शुगर / लिकर / उद्योग व् अन्य महत्व पूर्ण उद्योग चल रहे हैं / उनमें दोराला , सकोती , खतोली, मंसूरपुर , रोहाना . व् देवबंद शामिल हैं / मुज़फ्फरनगर उत्तराखंड से सटा है तथा काफी महत्व पूर्ण हैं / इसमें तीर्थ स्थान शुक्रताल गंगा के किनारे स्थित हैं, जिसका ५००० वर्ष पुराना इतिहास हे /  मुज़फ्फरनगर के तिवावी सुगर मिल / तितावी गावं के पास माडी गावं मे खेत मैं खुदाई के दोरान हड़प्पा के समय के सिक्के भी मिले / देवबंद का विशव में अपना महत्त्व है / सहारनपुर भी हरियाणा , उत्तराखंड व् हिमाचल प्रदेश की सीमाओं को छूता है । सहारनपुर एक पुराने रेल मार्ग में हे तथा रेल जंक्शन है /  शाकुंभरी देवी , सहारनपुर के पास बेहट से कुछ किलोमीटर दूरी पर है / आई.आई.टी. रुड़की, व् रूडकी छावनी उत्तराखंड पास ही हे / एयर फोर्स सरसावा एयर बेश , डाक व तार प्रशिक्षण कालिज भी सहारनपुर में हे उत्तराखंड बन्ने से पहले तक हरिद्वार और रुड़की भी सहारनपुर में थे जो अब हरिद्वार जिले के गठन के बाद उत्तराखंड में शामिल हो गये हैं।इतना सब होने पर भी क्या यह दुर्भाग्य नहीं की भारतीय रेल ने मेरठ , मुज़फ्फरनगर -देवबंद सहारनपुर तक के रेल मार्ग को दोहरा करने के कार्य को अभी तक भी हाथ तक नहीं लगाया हे / इस मार्ग के दोहरीकरण न हो पाने से खुद रेलवे को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा हे / रेल गाड़ियाँ लेट चल रहीं हे . रेल ट्रेक अति व्यस्त हे / कभी भी सर्दियों में रेल ट्रेक दरक जाता हे / अभी हल ही में मुज़फ्फरनगर के पास रेल ट्रेक टूट गया था /रेल स्टाफ पर काम का दबाव बहुत अधिक हे / कम शटल चलने से रेलवे को आर्थिक हानि हो रही है, रेलयात्रियों को परेशानी तो हो ही रही हे /रेल मार्ग के दोहरा हो जाने से सहारनपुर-- ना गल - देवबंद मुज़फ्फरनगर- खतोली- दोराला मेरठ- मोदी नगर - गाजियाबाद से दिल्ली तक की यात्रा बहुत कम समय में पूरी की जा सकती है किन्तु सिंगल ट्रेक होने से मेल व एक्सप्रेस ट्रेन को भी घंटों लग रहे हैं। डीजल अधिक लगने से धन की बरबादी हो रही है। मार्ग के दोहरा न होने के कारण यात्रियों की अधिकता होने पर भी इस मार्ग पर दशकों से नई शटल ट्रेन नहीं चलाई जा रही है / मेने सहारनपुर के जे वि जैन कोलिज से वर्ष १९७७ से १९८१ अध्यन किया तब से लेकर यानि मेरे कोलिज period से वाही ट्रेन चलाई जा रही हेएक ट्रेन को नि कालने के ट्रेनों छोटे –छोटे स्टेशनों पर असुरक्षित खड़ा करना पड़ता है। रूडकी - लक्षर- हरिद्वार रेल मार्ग पर दशकों से वाही शटल चल रही हे / जबकि आबादी बहुत बढ़ चली /



मेरठ- मुज़फ्फरनगर , दोराला , सकोती , मंशुरपुर , खतोली , देवबंद , नांगल , टापरी सहारनपुर व आस – पास के क्षेत्र के लोगों के लिये दिल्ली जाने का सबसे सस्ता व आसन साधन रेल ही है, बशर्ते रेल शटल समय पर उपलब्ध हो। यदि रेलवे द्वारा इस मार्ग का दोहराकरण कर दिया जाये व् हर आधा घंटे में शटल सहारनपुर - मुज़फ्फरनगर - मेरठ से दिल्ली- गाजियाबाद के लिए चलयी जाये / तो रेल की आय व् रेल यात्रियों की बल्ले बल्ले हो जाए / ग्रामीण क्षेत्रों में पड़ने वाले गावं व् नांगल - देवबंद - रोहना -मंशुरपुर - खतोली -सकोती - दोराला - मोदीनगर - गाजियाबाद - के बहुत से लोगों को रोजगार शिक्षा का फायदा होगा / हाई वे ५८ पर भी वाहन कम किये जा सकते हैं /। रेलवे शटल न चला जहाँ लोगों को असुविधा का कारन बन रही हे वहीँ आर्थिक नुकसान भी उठा रही है।आय का काफी बड़ा स्रोत ख़त्म कर रही हे /एक ओर राज्य सरकार व् केन्द्रीय सरकार मेरठ और दिल्ली के बीच में तीव्रगामी मैट्रो रेल के प्रस्ताव स्वीकार कर रही है वहीँ दूसरी ओर मेरठ - मुज़फ्फरनगर - देवबंद - सहारनपुर के रेल मार्ग को दोहरा नहीं किया जा रहा है केवल सर्वे की बात की जा रही है । हालाँकि लोगों व् जनप्रतिनिधियों द्वारा रेल बजट आने से पहले ज्ञापन रेलमंत्री व् संबोधित प्रशासन को भेजे जा रहे हैं, व् यहाँ तक की राज्य सभा मे भी मार्ग के दोह्राकरण के प्रशन उठाये जा रहें है परन्तु उन पर क्या कार्यवाही हुई, किसी को ज्ञात नहीं है। अर्थात वहीँ रिजल्ट जीरो /ब्लोग के माध्यम से रेल मंत्रालय, रेल मंत्री जी व् जन प्रतिनिधि से अपार जन हित में अनुरोध हे की मेरठ- टापरी के रेल मार्ग को दोहरा किया जाए तथा साथ ही यहाँ के निवासीयों से अपील हे विशेषकर गाजियाबाद - मोदीनगर - मेरठ - दोरला -सकोती - खटोली - मंसूरपुर -रोहना -देवबंद -नांगल ,मुज़फ्फरनगर, सहारनपुर, रूडकी हरिद्वार, लक्सर देहरादून व आस पास के क्षेत्रों के लोगों द्वारा लाइन के दोह्राकरण के लिए आवाज उठानी चाहिए /उत्तरप्रदेश राज्य मे आगामी चुनाव में उसी पार्टी को वोट किया जाए जो इस सम्बन्ध में तुरन्त कदम उठाये / तथा मिडिया का प्रयोग कर मामले को उठाया जाये / मिडिया से भी ऐसी ही अपील हे /रेल मंत्रालय को हर रोज़ ई मेल प्रेषित की जायें और अपनी मांग दोहराई जाये ।रेलगाड़ियों में, रेलवे स्टेशनों पर स्टिकर लगा कर अपनी मांग के लिये जन-समर्थन जुटाया जाये। तथा अन्याय को उजागर किया जाए /लोकपाल की आवाज वाले भी इस आवाज को उठायें / काले धन के साथ इस और भी ध्यान खीचा जाए / उत्तरप्रदेश के आगामी चुनावी सभा मे इस मांग को पुरजोर से उठाया जाए /शायद केंद्र सरकार वर्ष २०१२ के आगामी रेल बजट में इस रेल मार्ग को दोहरा कर न के लिए कुछ कदम उठाये|  

- सतीश मित्तल, दिल्ली

skumar630@yahoo.co.in


Art is not for hurting people - Kamal Nath

Posted by Sushant Singhal on November 14, 2011 at 1:15 PM Comments comments (0)

 

कमलनाथ की एक मनमोहक कृति

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में प्रसिद्ध हो रहे सहारनपुर की शान में एक और तमगा लगा है और इस तमगे का नाम है - कमलनाथ !  वर्ष 1969 में कलकत्ता में जन्मे कमलनाथ एक ऐसे कलाकार हैं जो किसी कला महाविद्यालय से ड्राइंग पेंटिंग की शिक्षा विधिवत रूप से ग्रहण न करने के बावजूद अपनी अद्‍भुत प्रतिभा के बल पर देश - विदेश में लाखों लोगों के चहेते बन चुके हैं। आपकी बनाई हुई ऑयल पेंटिग्स की प्रदर्शनी न केवल भारत में बल्कि कनाडा, आस्ट्रेलिया, दुबई और सिंगापुर आदि अन्य देशों में भी लगाई गई हैं और देश विदेश में अनेक लोगों ने आपके किये गये अद्‍भुत कार्य को अपने ड्राइंग रूप व शयनकक्ष की दीवारों पर गर्व के साथ सजाया है। 


प्रस्तुत है कमलनाथ के साथ एक विशेष बातचीत जो ताज होटल में आज ही आरंभ हुई त्रि-दिवसीय प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर कला-दीर्घा में घूमते- घूमते, उनके द्वारा बनाये गये तैल चित्रों का अवलोकन करते करते हुई !




सहा. डॉट कॉम -  पेंटिंग करने के लिये  कैनवस और ब्रश हाथ में लेने हेतु आपको प्रेरणा कहां से मिलती है?


कमलनाथ - पेंटिंग करना मुझे भाता है,  कैनवस के आगे जब मैं आ खड़ा होता हूं तो मुझे और कुछ भी होश नहीं रहता !  प्रेरणा कौन है, यह भी स्पष्ट रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता ।


सहा.डॉट कॉम - पर फिर भी, पेंटिंग बना लेने  के बाद आप उसे सबसे पहले किसको दिखाना चाहते हैं ?


कमलनाथ - घर में पेंटिंग करता हूं, कहीं एकांत में नहीं अतः पत्नी और बच्चे तो मुझे कैनवस पर कार्य करते हुए देखते ही रहते हैं। किसी अन्य विशेष व्यक्ति को दिखाने का प्रयास करता हूं,  ऐसा तो मुझे नहीं लगता !


सहा.डॉट कॉम - यहां प्रदर्शित आपकी लगभग सभी कृतियों में नारी के ही विभिन्न रूपों का ही चित्रण है,  कुछ चेहरे भारतीय हैं तो कुछ विदेशी हैं।   पेंटिंग बनाते समय क्या कोई परिचित चेहरा कैनवस पर बार - बार उभरने लगता है?


कमलनाथ - कुछ पेंटिंग में तो मेरा अपना बेटा ही चित्रित हुआ है जिसको विभिन्न काल्पनिक रूपों में देखता हूं।  पर इनमें से उसका कोई भी स्वरूप ऐसा नहीं है, जो वास्तविक हो ।   यह यथार्थ और कल्पना का मनमाना मिश्रण है।     कभी कभी कोई दृश्य मन को बहुत भा जाता है तो उसे उस समय अपने कैमरे में संजो लेता हूं।    बाद में उसमें अपनी कल्पना के अनुसार परिवर्तन करके मनमाने रंग भरता रहता हुं ।  


सहा. डॉट कॉम - आपकी दृष्टि में कलाकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कितनी होनी चाहिये?  क्या किसी कलाकार को अपनी रचनाओं से किसी की भावनाओं को आहत करने की अनुमति दी जा सकती है?  


कमलनाथ -  यदि आप यह एम.एफ. हुसैन साहब की कुछ कृतियों को लेकर उठे विवाद के संदर्भ में पूछ रहे हैं तो मेरा स्पष्ट मानना है कि कोई भी कलाकार कभी किसी की भावनाओं को जानबूझ कर आहत करने का काम नहीं करना चाहेगा।  यदि किसी रचना से किसी धार्मिक समूह की भावना आहत हुई हों तो उसे अपनी रचना वापिस ले लेनी चाहिये और भविष्य में कहीं पर प्रदर्शित नहीं करनी चाहिये। 


सहा. डॉट कॉम - पर एम.एफ. हुसैन ने तो अनेकानेक कृतियां ऐसी बनाईं जो हिन्दू जनमानस को उद्वेलित करती हैं,  उनको देख कर क्रोध आता है।  और किसी भी धर्म के देवी - देवता को तो उन्होंने ऐसे कभी भी चित्रित नहीं किया ।


कमलनाथ -  हुसैन साहब बहुत बड़े कलाकार रहे हैं और मैं उनके सम्मुख कुछ भी नहीं फिर भी इतना तो कह सकता हूं कि यदि मेरी किसी रचना से कभी भी, किसी को भी दुःख पहुंचेगा तो मैं स्पष्ट शब्दों में माफी मांगते हुए ऐसी किसी भी रचना को कहीं पर भी प्रदर्शित या प्रकाशित नहीं कराऊंगा।   मेरे लिये मेरी ये कला व्यवसाय नहीं है,  स्वयं खुश रहने और दुनिया में खुशियां बिखेरने का साधन है।    इससे किसी के हृदय को चोट पहुंचे, यह मुझे स्वीकार्य नहीं है।    मेरे चित्र सकारात्मक हैं, जीवन के उजले पक्ष को सम्मुख रखते हैं और देखने वालों के मन में जीवन के प्रति आस्था जगाते हैं।   मुझे कला का यही रूप पसन्द है।   मैं अपने चित्रों से, अपनी कला से किसी को बेचैन नहीं करना चाहता  जबकि कुछ लोग जीवन के नकारात्मक पहलुओं को उभारने को ही सच्ची कला मानते हैं । 


इस अवसर पर कमलनाथ का उत्साहवर्द्धन करने के लिये मौजूद प्रसिद्ध चित्रकार श्री रामशब्द सिंह से भी बातचीत हुई ।   उनके अनुसार कमलनाथ के चित्र दोनों प्रकार के  कलाप्रेमियों को पसन्द आते हैं ।  जो लोग कला की गहराइयों में उतर कर इन चित्रों की सफलता और महत्ता को आंकते हैं उनको भी और जो पेंटिंग खरीद कर अपने ड्राइंग रूप में सजाना चाहते हैं, उनको भी कमलनाथ प्रभावित करते हैं।   कुछ चित्रों को देख कर लगता है कि ये कमलनाथ ने अपने मन की खुशी के लिये बनाये हैं जबकि कुछ चित्रों को देखकर ऐसा आभास होता है कि इस कलाकार ने यह चित्र बनाते समय इस बात का भी ध्यान रखा होगा कि ये चित्र व्यावसायिक रूप से भी सफल हो !     


वज़ाहुल हक़ ’काशिफ’ की भावनाओं में भी यही विचार प्रतिध्वनित होते हुए लगते हैं।   उनके अनुसार अच्छी कला वही है जो खुशी दे, जिसको देख कर चेहरे पर मुस्कान आये, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को पोषण मिले ।  उनके अनुसार कमलनाथ की कला इस कसौटी पर खरी उतरती है। 


पत्रकार एवं लेखक डा. वीरेन्द्र आज़म के अनुसार कमलनाथ प्रकृति और प्रेम के चितेरे चित्रकार हैं जिनकी पेंटिंग इठलाती भी दिखती है और खिलखिलाती भी !  उनकी पेंटिंग में श्रृंगार भी है, तरुणाई भी, सांझ की लालिमा भी है और अरुणाई भी !


प्रसिद्ध चित्रकार, लेखक, कवि एवं पूर्व वरिष्ठ आई. ए. एस. अधिकारी आर. पी. शुक्ल के शब्दों में - " कमलनाथ वाटर एक्रेलिक व ऑयल पेंटिंग के सिद्धहस्त कलाकार हैं जिन्होंने अपनी रंगों से भरी तूलिका से कैनवस पर जीवन के विभिन्न पक्षों को अभिव्यक्त किया है।  उन्होंने भारतीय संस्कृति की कलात्मक परंपरा से रस ले कर आधुनिकता को भी चित्रित किया है।

   


 


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